Saturday, December 31, 2016

किसमिस

किसमिस, कोई ५-६ साल की होगी। वो भविष्य निधि कार्यालय यानी PF Office की सीढ़ियों पर बैठी खेल रही थी। वहीं पास में किसी कर्मचारी की मेज के सामने उसकी माँ खड़ी थी। हाथ में कागज़ और माथे पर शिकन लिए अपनी बारी आने की प्रतीक्षा कर रही थी। जाने वो चिंता की शिकन थी, घृणा की या फिर क्रोध की।

मैं अपने एक मित्र, राममेहर, के साथ उसके काम के लिए वहाँ गया था। वो नयी दिल्ली स्टेशन आया और हम वहाँ से सीधा द्वारका स्टेशन की ट्रेन पकड़ कर गए। मेट्रो थी, इसी वजह से गर्मी का अहसास नहीं हुआ वर्ना बाहर तो बदन को झुलसाने वाली लू पड़ रही थी। हम लोग द्वारका स्टेशन से उतरे और रिक्शा ढूँढने लगे। बाहर आने पर सोच रहा था कि रिक्शा भी वहीं की वहीं मिल जाए। इतनी गर्मी में बाहर सड़क तक जाने की तो हिम्मत ही नहीं हो रही थी। खैर, अंदर तो कोई रिक्शा मिलीं नहीं इसलिए हम लोग सड़क पर पहुँचे। वहाँ २-३ रिक्शा खड़ी थी। उन रिक्शा चालकों में से एक कोई १४-१५ साल का बच्चा होगा।

मैंने पूछा - छोटे, PF Office के कितने लेगा?

वो बोला - ३० रुपये।

वहीं खड़ा रिक्शा वाला, जो काफी जवान था, बोला - चलिए भैया मुझे २० रुपये दे दीजियेगा।

राममेहर बोला - क्या भाई, बच्चे को भी कमा लेने दे।

हम लोग बच्चे की रिक्शा में चढ़े। कोई १०-१५ मिनट का रास्ता था। एक मैं था जो कुछ पल की गर्मी के कारण परेशान हो रहा था और एक वो बच्चा जो इतनी कड़ी धूप में भी रिक्शा चला रहा था। अभी तो उम्र से वो कच्चा ही था।

मैंने उससे पूछा - स्कूल भी जाता है कि नहीं?

"जाता हूँ।"

"कौन सी क्लास में?"

"आठवीं में।"

"कौन से स्कूल में।"

"सरकारी स्कूल में।"

उसकी आवाज में तीखापन था, जैसे वो मेरे सवालों से तंग हो रहा हो। मेरे सवाल ख़त्म हुए तो राममेहर के शुरू हो गए।

"सचमुच जाता है या झूठ बोल रहा है?"

"जाता हूँ।"

"तो फिर आज क्यों नहीं गया?"

"आज छुट्टी ले ली थी।"

"तो फिर हर रोज रिक्शा कैसे चलाता है?"

"स्कूल से आने के बाद।"

"और पढ़ाई किस समय करता है?"

"पढ़ता हूँ।"

"क्या नाम है तेरा?"

"राजा।"

"हमको तेरे बारे में सब पता चल गया है, हम तेरे स्कूल में आके देखेंगे कि तू सच बोल रहा है कि नहीं।"

"पूछ लेना।"

हम लोग PF Office के सामने उतरे, उसे पैसे दिए और अंदर चले गए। कोई सौ कदम भी नहीं चलने पड़े थे कि मैं पसीने से तर बतर हो गया था, और मेरी साँस भी फूलने लगी थी। मेरे दिल की धड़कन तेज हो गयी थी। राममेहर पूछताछ केंद्र की तरफ़ गया और मैं वहीं पास में एक कुर्सी पर बैठ गया। मैंने कुछ देर लंबी लंबी सांसें ली तब जाकर कहीं मेरे अंदर का संतुलन बना।

थोड़ी देर बाद राममेहर मुझे लेकर एक कमरे की तरफ़ गया। उस कमरे के एक कोने में काफी बड़ी उम्र के अंकल बैठे थे। वो उसी दफ्तर के कर्मचारी थे। उसके सामने एक मेज रखी थी जिस पर उसका कंप्यूटर और कुछ कागज़ात रखे थे। उसकी मेज के सामने लोग दो कतारों में खड़े थे जबकि उन्हें एक ही कतार में खड़ा रहने को कहा जा रहा था। आगे वाले लोग अपना काम निकलवाने की जल्दी में और पीछे वाले लोग अपनी बारी आने की जल्दी में थे। उक्त अधिकारी लोगों पर चिल्ला रहे थे, "सब लोग एक ही लाइन में खड़े हो जाओ वर्ना मैं काम करना बंद कर दूँगा।"

उनकी बायीं तरफ़ कुछ तीन गज की दूरी पर दो और कर्मचारी बैठे थे। उनके पास भी भीड़ जमा थी पर वो अपना काम शान्ति से कर रहे थे। शायद उन्हें नौकरी लगे ज्यादा समय नहीं हुआ होगा। इसी वजह से वो अपने काम का आनंद ले रहे थे। वहीं उसी कमरे में दरवाज़े के पास वाले एक कोने में सीढियाँ बनी हुई थी।

मैं वहाँ जाकर बैठ गया। मेरी दायीं तरफ़ वो छोटी बच्ची खेल रही थी। उसने मेरी तरफ़ देखा। मैं उसे देखकर मुस्कुराया। उसने मुह फुलाकर धीरे से अपना सर दूसरी तरफ़ घुमा लिया। कुछ पल बाद फिर मेरी तरफ़ देखा। मैं फिर मुस्कुराया। उसने एक झटके से फिर अपना सर घुमा लिया। मैं उसकी तरफ़ देखता रहा। कितना प्यारा, मासूम और चित आकर्षित कर लेने वाला चेहरा था। जब भी हम दोनों की नज़रें मिलती थी तो वो अपनी गोल मटोल सी आँखें झुका लेती थी। वो कुछ भी तो बनावटी नहीं था। मैं उसे देखते देखते खो सा गया था। जैसे मेरा उस नन्हीं सी जान से काफी गहरा रिश्ता हो। मैं अपने से जुड़ी हर बात भूल गया था। मेरे अंदर कोई अशांति, घबराहट, परेशानी और अधीरता कुछ भी बाकी नहीं था। बस एक अहसास था।

मेरी नज़र वहीं पास खड़ी उसकी माँ पर पड़ी। उसकी माँ ने भी मेरी तरफ देखा। उन्होंने बिना ये सोचे कि मैं उनकी बातों में दिलचस्पी लूँगा या नहीं, बोलने लगी, "कितने दिन हो गए चक्कर लगाते लगाते, ये लोग कोई काम करके ही नहीं दे रहे।"

मैं उसे ध्यान से सुनने लगा। उसने अपनी बात जारी रखी, "मेरे पति का एक्सीडेंट हो गया इस होली के बाद और अब दो महीने हो गए। उनके PF का पैसा आधा तो मिल गया था बाकी आधे का पेंशन में बदल रहे हैं। कभी बोलते है ये कागज़ नहीं है कभी वो नहीं है। प्रतापगढ़ से आयीं हूँ, इतनी गर्मी में मेरी बच्ची को साथ में लाना पड़ता है।"

मैंने पूछा - उनके ऑफिस में गए थे? क्या कहा उन्होंने?

वो बोली - गयी थी। वहाँ का चपरासी मेरे साथ मदद करने आया है।

तभी वो व्यक्ति वहाँ आया। वो गुस्से में था।

मैंने पूछा - ऑफिस में कोई होगा ना जो ये सब संभालता होगा।

वो बोला - है। लेकिन उसने एक जरुरी फॉर्म भरके आगे भेजा ही नहीं।

वो उसकी माँ की तरफ घूमा - उस विजय ने कोई फॉर्म नहीं दिया है। उस फॉर्म के बिना यहाँ कुछ नहीं कर सकते।

उसकी माँ बोली - कल मुझे ऑफिस लेके चलना, मैं उस विजय की खबर लूँगी।

ये देख ख़ुशी हुई कि वो व्यक्ति बिना किसी अपेक्षा के उनकी मदद कर रहा था। वो बच्ची अब मुझे देख कर मुस्कुरा रही थी। राममेहर अपने काम की पूछताछ कर वापिस आया।

मैं उसके साथ बाहर की तरफ़ चल दिया। उसके फॉर्म में नाम की गलती थी। उसके हर कागज़ में उसका अलग ही नाम था। उसके नाम की स्पेलिंग हर कागज़ में गड़बड़ थी। उसे नाम बदलने के लिए एक और फॉर्म भरना था। कुछ देर बाद हम फिर उसी कमरे में गए। बच्ची की माँ वहीं खड़ी थी लेकिन बच्ची नहीं थी। उसकी माँ ने मुझसे उसे देख आने के लिए निवेदन किया। मैं बाहर देखकर आया। वो उसी चपरासी के साथ बैठी थी। मैंने आकर उन्हें बता दिया।

राममेहर का वहाँ का काम निपट चुका था। हम लोग बाहर की तरफ गए। राममेहर अपने ऑफिस फ़ोन करने लगा। मैं तब तक इधर उधर घूमने लगा। वो बच्ची और वो चपरासी वहीं कुछ दूरी पर बैठे हुए थे। तभी उसकी माँ भी वहाँ आ गयी। मैं उनके पास गया और उस बच्ची का नाम पूछा।

"किसमिस।"

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