Friday, May 20, 2016

त्रिउंड - SOLO Trip

पहली बार किसी सफर में अकेला जा रहा था। थोड़ी घबराहट थी, लेकिन उत्साह भी था। यूँ तो मैं कभी अकेला कहीं घूमने नहीं गया था। जब भी गया किसी ना किसी दोस्त के साथ गया। मैं सोचता था कि, "अकेले घूमने जाने का मतलब ही क्या है? वहां किसके साथ मस्ती करेंगे?" मेरे बहुत दोस्त है जो अकेले घूमने जाते हैं, या अंग्रेजी में बोले तो "SOLO Trip" करते हैं।  मुझे लगा कि एक दफा मुझे भी जाकर देख ही लेना चाहिए। फिर भी हिम्मत नहीं बनी। मैंने अपने साथ चलने के लिए कुछ मित्रों से पूछ ही लिया। एक दोस्त राजी हो गया और मैंने हम दोनों की टिकट ले ली। वो एक दिन पहले जाने से मना कर गया। फिर मैंने मन बना लिया कि मैं अकेला ही जाऊंगा। पहाड़ों में घूमने जाना था तो बहुत खोजबीन कर एक जगह चुनी, त्रिउंड (Triund)। त्रिउंड उस पहाड़ी जगह का नाम था जो मैक्लोडगंज (धर्मशाला, हिमाचल प्रदेश) में पड़ती है।

दिल्ली से धर्मशाला कोई बारह घंटे का सफर था। खाने की कुछ दिक्कत ना हो इसलिए दिल्ली बस अड्डे से मैंने चार पराठें पैक करवा लिए थे। कोई एक घंटा इंतजार करने के बाद बस आई। बस में ऐसी जगह मिली जहां मेरे एक तरफ वाला आदमी पिया हुआ था (जो जगह मैंने अपने दोस्त के लिए ली थी और फिर रद्द कर दी थी।) और सामने वाले की सीट की कमर मेरे घुटनों में लग रही थी। सुबह सुबह कोई धर्मशाला से अढ़ाई घंटे पहले किसी गावं में बस खराब हो गई। हम सबको दूसरी बस में भेजा गया। कुल मिलाकर बस के सफर में थोड़ा तंग ही रहा।

कोई सात बजे मैं धर्मशाला पहुंचा। वहां अपने सुबह का कुदरती काम निपटाया ताकि रस्ते में कोई तकलीफ ना हो। वहाँ से मैक्लोडगंज की बस ली। बस में ब्राज़ील और इटली की दो महिलाओं से मुलाकात हुई। उन्हें मैक्लोडगंज से धर्मकोट जाना था तो मुझसे पूछ रही थी कि कैसे जाना है। मुझे भी अपना ट्रैक वहीं से शुरू करना था। मैक्लोडगंज से धर्मकोट की कोई बस नहीं थी। वहाँ सिर्फ ऑटो या टैक्सी ही चलती है। टैक्सी थोड़ी महंगी थी इसलिए एक ऑटो लिया और हम तीनों ही धर्मकोट के लिए निकल पड़े। रस्ते में हमनें बहुत सी बातें की। उन्होंने मेरे बारे में कुछ पूछा, मैंने उनके बारे में कुछ पूछा। वो लोग योग के दस दिन वाले शिविर में आईं थी। विपासना (Vipassana) नाम से कोई संस्थान है जो १० दिन का योग शिविर करवाता है। जानकारी के लिए बता दूँ ऐसी बहुत सी संस्थायें है जो ऐसा शिविर लगाती रहती है। कुछ पैसे लेती है और कुछ मुफ्त में करवाती है। खाना, पीना व रहना सब उनके शिविर में ही होता है।

वो लोग मुंबई में किसी ३ महीने का योगाभ्यास करके आयीं थी, जहाँ उन दोनों की मुलाकात हुई थी। कुछ ही देर में हम लोग धर्मकोट पहुचें। उनका शिविर अगले दिन से शुरू होना था। उन्हें उस दिन रहने के लिए कोई कमरा चाहिए था। उन्हें हिंदी तो आती नहीं थी तो उलझन में थी कि वहाँ रहने का इंतजाम कैसे हो। मैंने उनकी थोड़ी मदद की और उन्हें एक कमरा दिलवाया। उन्हें वहां खाने पीने के बारे में सब समझा दिया। उन्होंने मुझे मदद के लिए धन्यवाद किया और गले लगाकर विदा किया। 

वहां से मैं एक दुकान में नाश्ता करने गया। वहाँ खाना थोड़ा महंगा था लेकिन वो जगह बहुत अच्छी थी। अंदर वाले कमरे में थोड़ा शाही माहौल था, बैठने के लिए गद्दे बिछे थे और कम ऊंचाई वाली मेज रखी थी। वहीं एक रैक पर कुछ किताबें, लकड़ी की कुछ शतरंज और ताश के पत्ते रखे थे। वहाँ का मालिक हिंदी, अंग्रेजी और हिमाचली भाषा तो जानता ही था और कुछ एक बाहर देशों की भाषाएं भी जानता था। 

नाश्ता करने के पश्चात निकला ही था की कुछ ही दूर एक दम्पति भक्ति गीत गा रहा था। मैं कोई खास धार्मिक इंसान तो नहीं हूँ लेकिन फिर भी उनकी आवाज इतनी सुरीली थी कि मैं मंत्रमुग्ध हो गया था। मेरे कदम अपने आप धीमे हो चले थे ताकि मैं उन्हें कुछ देर तक सुन सकूँ। मेरा वहां रुकने को मन हुआ लेकिन फिर देखा कि कोई भी वहां नहीं ठहर रहा था। मैं भी मारे शर्म के उनके डब्बे में १० रुपये डाल कर बिना रुके चल दिया। काश! मैंने वहां रूक कर उन्हें कुछ देर सुन लिया होता। जिंदगी में ऐसे बहुत से छोटे छोटे पल आते हैं जिन्हे हम अनदेखा कर देते हैं लेकिन वो पल हमारी जिंदगी के कुछ खूबसूरत पलों में से एक होते हैं। उन्हें थोड़ा सा ही सही लेकिन सुनने के बाद अंदर की घबराहट बिलकुल ही खत्म हो गई थी और मेरा उत्साह दुगुना हो गया था। 

रास्ते में मैं ऊपर रहने के बारे में सोचता जा रहा था। बस में, धर्मशाला बस अड्डे पर और धर्मकोट में भी बहुत लोगों से पूछा कि रहने का इंतजाम कैसे होता है? कोई बोलता था Travel Agent के साथ चले जाना, कोई बोलता नीचे से तम्बू लेते जाना और कोई बोलता कि वापिस नीचे चले आना। मैंने बिना कुछ लिए चढ़ाई शुरू कर दी थी। सबसे पहले मुलाकात हुई ३ पंजाबी लड़को से, बड़े मस्त मौला लड़के थे। पूछने पर पता चला कि पिछले साल में छब्बीस बार वहाँ आ चुके हैं। उनसे बड़ी जल्दी ही दोस्ती हो गई थी। आधे रास्ते तक तो कभी वो लोग आगे रहते और कभी मैं आगे रहता। वहाँ दिन के समय धूप बहुत ज्यादा थी इसलिए मैं बहुत रुकता हुआ जा रहा था। हमारा साथ रास्ते में ही छूट गया। चलते चलते कुछ ऐसे लोग मिलें जिन्हे देखकर प्रेरणा मिलती थी। एक अंकल जी थे जो अपनी पत्नी और बेटियों के साथ आये थे। कुछ लोगों की एक  टोली थी जिनमे एक बड़ी उम्र का भोला भाला लड़का था जिसकी समझ एक बच्चे के जैसी ही थी। एक और व्यक्ति जिसे चलने के लिए लाठी का सहारा लेना पड़ रहा था। कुदरत ने उसके पैर को तो कमजोर बनाया पर उसके हौसलों को नहीं। बाकी अलग अलग टोलियों में लोग जा रहे थे जिनकी हंसी ठिठोली के सहारे मेरा रास्ता बड़े मजे से गुजरा। 

मैं करीब शाम के ३ बजे ऊपर पहुँचा। ऊपर का मौसम ऐसा था कि धूप में तो गर्मी लगती थी और छांव में ठण्ड लगती थी। शनिवार का दिन था तो वहाँ बहुत से लोग आये थे। पहाड़ के एक तरफ से दूसरी तरफ, हर जगह तम्बू लगे थे। मैं कोई अच्छी सी जगह देखकर बैठ गया। वहाँ बैठे बैठे दो और दोस्त बन गए थे। एक तो मेरी ही तरह कविता प्रेमी था। उनके साथ काफी देर तक रहा। फिर मुझे अपने तम्बू लेना था तो मैं भी सबसे सस्ते के चक्कर में इधर उधर घूमने लगा। कुछ देर बाद मुझे तम्बू मिल ही गया और मैं निश्चिन्त होकर वहीं पास में एक बड़े से पत्थर पर बैठ गया। कितनी शान्ति थी, सुकून था। तभी कुछ देर बाद एक और टोली आयी। 

पांच लोग आये थे जिनमे से चार तो पंजाब के थे, इसलिए उनमे मसखरापन तो स्वाभाविक ही था। पाँचवा, अंकित, अहमदाबाद (गुजरात) का था अकेले आया था। हम जल्दी ही अच्छे दोस्त बन गए। वो कुछ दिनों बाद से दिल्ली में ही रहने वाला था तो हमारी भविष्य यात्रा के भी कार्यक्रम बनने लगे। शाम को वहाँ ठण्ड बहुत बढ़ जाती है। चूँकि वो लोग एक गाइड के साथ आये थे तो उनका रात का कार्यक्रम तय था। मैंने भी उनके साथ ही रहने का मन बना लिया था। अँधेरा हो चला था। आसमान एकदम साफ़ था। चाँद एकदम नयी नवेली दुल्हन की तरह खिला खिला सा था। उनके गाइड ने लकड़ियां जला दी और हम लगभग १५-२० के करीब लोग इकट्ठा हो गए थे। सब अपनी अपनी टोली के लोगों से बातें करने में लगे हुए थे। उन्ही पंजाबियों की करामात थी कि सबने अंताक्षरी खेलना शुरू कर दिया। गाते बजाते कब रात के बारह बज गए, पता ही नहीं चला। आग बुझ गई थी। हम सब लोग किशोर दा वाला "चलते चलते" गीत गाकर अपने अपने तम्बू में चले गए।हालाँकि ये गीत हम सब से शायद ४-५ बार गाया होगा लेकिन सब लोग जाने की बजाय फिर से गाना शुरू कर देते थे। उस रात हम सब लोग एक दूसरे से एक अद्भुत रिश्ते में बंध गए थे। वो संगीत की ही ताकत थी जिसने कुछ अंजान लोगों को जोड़े रखा। वैसे अगले दिन एक बात का पता चला कि कोई लड़की अँधेरे में किसी की कुदरती करामात (मल) पर बैठ गई थी।

अगले दिन मैं सुबह सुबह जल्दी ही उठ गया था। बर्फ से ढकी पहाड़ियां चमक रही थी। ठंडी ठंडी हवा के झोंके चेहरे को छू रहे थे। कुछ ही देर में सब लोग उठ गए थे। कुछ सुबह का आनंद ले रहे थे और कुछ तसवीरें खींचने का। उस दिन सबको शाम में अपने अपने घरों के लिए निकलना था। हम लोग सुबह ही नीचे उतरने वाले थे। धर्मशाला से दिल्ली की बसें रात में चलती है। इसलिए मैं पूरा दिन ख़ामख़ा व्यर्थ ना करना चाहता था। मुझे पता चला था कि उतरकर कोई १ घंटे के ट्रैक के बाद एक झरना है। मैंने वहां जाने का मन बनाया। अंकित की बस भी शाम को ही थी। झरने से वापसी का समय सुनिश्चित करके हम नीचे उतरने लगे। रास्ते में वही लोग मिले जो रात में गा रहे थे। कुछ देख के मुस्कुरा देते और कुछ सीधे चले जाते।

हम लोग नीचे उतर रहे थे, बीच में थोड़ा रुक भी रहे थे। एक लड़की कानों में विद्युत ध्वनि यंत्र यानी Earphone लगाए अपनी मस्ती में चली जा रही थी। हमें देखकर उसने हेल्लो बोला और हमारे जवाब की अपेक्षा किये बिना ही आगे निकल गयी। ध्यान से देखा तो ये भी पिछली रात हमारे साथ गा रही थी। वो ही अकेली ऐसी लड़की थी जिसे सबसे ज्यादा गीतों के बोल पता थे। हम लोग दो पंक्तियाँ गाकर चुप हो जाते और वो गाती रहती। फिर देखती सब चुप है तो वो भी चुप हो जाती। मुझे लगा था कि बड़ी मासूम सी लड़की है। वो तो उस दिन हमारी कुछ बातचीत हुई तो पता चला कि एकदम चंडाल लड़की है। वो अकेली नहीं थी, वो ३ लडकियां थी जो अपने गाइड के साथ आयीं थी। उनमे से एक ही लड़की ऐसी थी जो जैसी मासूम दिखती थी वैसी ही थी। हम लोग एक साथ ही नीचे पहुचें। 

हम लोगों ने थोड़ी बातें की फिर बताया कि हम झरने की तरफ जा रहे है। वो और उसकी सहेलियां भी तैयार हो गयी। उन्होंने अपने गाइड से साथ चलने को कहा तो वो मना कर गया। फिर उन्होंने बिना गाइड के ही हमारे साथ चलने का निर्णय लिया। अपने गाइड को बोलकर उन्होंने दिल्ली की टिकट करवाई तो गाइड उनसे वहीं खड़े पैर पैसे मांगने लगा। उनका गाइड उनकी ऐसी मट्टी पलीद गया कि क्या बताऊं। खैर, हम लोग झरने की तरफ चलना शुरू हुए। हम ५ लोग थे, ३ तो वही चांडाल चौकड़ियां (आयुषी, सुएशी, शिवि) और बाकी हम २ मासूम से लड़के (अंकित और मैं )।

वो लोग पहली बार ट्रैकिंग करने आये थे और मेरा तजुर्बा इस मामले में उनसे ज्यादा था। सुएशी कभी तो मुझे माउंटेन मैन कहती तो कभी बन्दर कहती। हम लोग कुछ १ घंटा बाद झरने पर पहुचें। वहां जाते ही अंकित ने एक विदेशी महिला को देखते ही बोल दिया - "ये तुम लोगों की भाभी है।" बस ये कहकर उसने अपनी पहली बेइजत्ती तो वहीं करवाली थी। हम लोग अपना अपना बैग वहीं छोड़कर झरने की ओर चले गए। पहाड़ के एक कोने में झरना गिर रहा था। झरने के आगे एक छोटा सा तालाब था जिसमे कहीं कहीं पत्थर रखे थे। पत्थर पर चढ़कर आराम से खड़े रह सकते थे वर्ना पानी सर के ऊपर से था। आस पास बर्फीले पहाड़ों से बर्फ पिघलकर झरने का रूप ले रही थी। पानी इतना ठंडा था कि तीर की तरह चुभता था। लेकिन उत्साह ऐसा था कि फर्क नहीं पड़ता था। सुएशी को तैरना अच्छे से आता था। वो ही हमें झरने के नीचे तक ले गई। उसे देखकर लग रहा था कि वो गलती से लड़की बन कर पैदा हुई। झरने का पानी सर पर आशीर्वाद की तरह लग रहा था। उससे ज्यादा आनन्दयी वहां कुछ भी नहीं था। थोड़ी देर बाद हम लोग पानी से बाहर निकले। हम सभी ठण्ड के मारे थर्र थर्र कांप रहे थे। पानी से बाहर निकल कर वहीं गए जहां अपने बैग रखे थे। बस वहीं सबके असली रंग ढंग पता चले। 

अंकित इंजीनियरिंग लाइन में होकर भी जिसे सेल्फी तक नहीं खींचनी आती थी। यहां उसने फिर से अपनी बेइजत्ती करवाई। शिवि, जो बस यही गिन रही थी कि दूसरे लोगों ने हमें कितनी बार नकारा है और फिर कहती - "करवाली बेइजत्ती।" आयुषी, जैसी दिखने में मासूम थी वैसी ही मासूमियत भरी उसकी बातें थी। अकेली वही थी जो किसी की बेइजत्ती नहीं कर रही थी। सुएशी, हमारी टोली की सबसे खतरनाक लड़की थी। वो हम सबकी कुछ न कुछ लगती थी। उसने वहां एक चित्रकार महोदय को देखा जो भारतीय लग रहे थे और उनकी पत्नी बाहर देश की महिला थी। सुएशी को भ्रम हुआ कि वो कोई मशहूर हस्ती हैं। वो उनसे बात करने के लिए उतावली हुई जा रही थी। झरने पर बात करने का एक मौका मिला लेकिन वो उसने ये सोचते सोचते खो दिया कि बात करे या ना करे। उसकी शक्ल देखने लायक थी। हम लोग नीचे उतरे तो रास्ते में चाय की दूकान पर उन महाशय से फिर मुलाकात हो गयी। मैंने सुएशी को इशारा किया। वो पहले तो बहुत उछली, फिर थोड़ा होश सम्भाला। उसने "hello sir" बोला लेकिन उसकी आवाज ऐसे थी जैसे गले में कुछ फस गया हो। फिर मैंने उन महोदय को इशारा किया। लेकिन बेचारी की किस्मत, ये तो कोई और ही महाशय निकले। सुएशी के आवेश की जो झंड हुई, बहुत मजा आया। 

रास्ते में हम लोगों के पास पानी खत्म हो गया था। वहाँ रास्ते के साथ साथ एक मोटी सी नली जाती थी जो झरने का पानी गांव तक पहुँचाती थी। भाग्य से एक जगह उस नली से पानी थोड़ा थोड़ा निकल रहा था। पानी का बहाव इतना था कि हम अपनी बोतलें आराम से भर सकें। मैं अपनी बोतल लेकर पानी भरने लगा। अंकित अपने बैग से बोतल निकालने लगा। उसने बैग खोला ही था कि जबरदस्त दुर्गन्ध फैली। दुर्गन्ध ऐसी थी जैसे अपने बैग में कोई लाश डालकर ले जा रहा हो। कुछ पल के लिए तो हम लोग अपना होश भूल गए थे। कुछ दूर तक दुर्गन्ध भी हमारे साथ साथ चली। कुछ देर में हम सब नीचे पहुचें जहां से सबको मैक्लोडगंज जाना था। हम लोग कोई ५ बजे मैक्लोडगंज वापसी पहुंचे। अंकित की बस ६ बजे मैक्लोडगंज से थी और मेरी ६:१४ धर्मशाला से थी। मैंने तो समय पर पहुंचा लेकिन बस देर से आई। बस में चढ़ा तो देखा अंकित भी उसी बस में है। हम खुश थे कि हमारा दिल्ली तक का साथ हो गया। इतना चलने और झरने के ठन्डे पानी में रहने के बाद थकान बहुत हो गयी थी। मैं तो बस घड़ियाँ गिन रहा था कि कब दिल्ली पहुचें और मैं आराम करूँ। थकान इतनी थी कि बस में भी बिना किसी तकलीफ के नींद आ गयी।

सुबह जैसे ही दिल्ली पहुचें, वहाँ से मेट्रो स्टेशन के लिए रिक्शा लिया। मेट्रो स्टेशन पहुंच कर पता चला अंकित महाशय अपना बटुआ बस में ही गिरा आये हैं। मुझे वहां बैठाकर वो अपना बटुआ लेने चल दिया। करीब आधे घंटे के बाद अपना बटुआ लिए वापिस आया। जब मेट्रो स्टेशन से बाहर निकलना था तो टोकन लेने वाली मशीन ख़राब हो गई थी। वहां भी बहुत देर तक रुकना पड़ा। कुल मिलकर अंकित भाई पर मनहूसियत छाई हुई थी। फिर मैं उसे अपने घर आराम करने के लिए ले गया। 

इन लोगों के साथ मैंने कुछ लम्हों में जिंदगी को जिया था। इस सफर में मैं तरह तरह के लोगों को देखा, उनसे मिला, उन्हें जाना। मैं अकेला ही सफर पर निकला था, पर वापिस लौटा कुछ प्यारे दोस्त और कुछ मीठी यादें लेकर। 




2 comments:

  1. Thanks for sharing your journey with us @sumit. I am sure this and many more future experiences will enrich your life more.

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    1. Thanks Rahul Bhaiya... I would've never done such awesome thing without your inspiration. :)

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