Sunday, May 22, 2016

जिम्मेदारी

जीवन में कई दफा ऐसे वाकये हो जाते हैं जो हमें अंदर से झकझोर के रख देते है। अगर हम गौर करें, तो उनका असर कहीं न कहीं हमारे अंदर कुछ अच्छा परिवर्तन ला ही देता है। इनमे बहुत से वाकये जुड़े होते है उन लोगों से जिनके लिए हम समझते है कि ऐसा जीना भी कोई जीना है। हमारे दिल में उनके लिए दया की भावना पैदा हो जाती है। पर हम उन लोगों के लिए कुछ कर पाएं या नहीं, लेकिन वो लोग हमारे जीवन में गहरी छाप छोड़ जाते हैं। ऐसा ही एक वाकया मेरे साथ हुआ जब मैं मुंबई की लोकल ट्रेन में सफर कर रहा था।

मैं मुंबई पहली बार आया था, तो मैं वहाँ के तौर तरीकों से वाकिफ नहीं था। मैं अपना मुंबई का सफर कम से कम बजट में रखना चाहता था। हम जितनी बार किसी सफर में निकलते हैं तो कोई ना कोई ऐसी बात या आदत सीखकर आते है जो हमारे जीवन के कठिन पहलू में बहुत काम आती है। उन्ही में से एक आदत थी जो मैंने सीखी, वो है कम से कम खर्चे में गुजारा करना। इसका मतलब ये कतई नहीं कि मैं कंजूस हो गया। इसका मतलब है कि जब भी मैं कठिन समय से गुज़रूँ तो संयम से काम ले सकूँ। मुंबई का सबसे सस्ता परिवहन वहां की लोकल ट्रेनें है। मुझे एक इवेंट के सिलसिले में IIT जाना था। मैं अपने एक दोस्त पंकज के साथ जा रहा था। हमसे कहा गया था कि २-३ दिन के लिए मुंबई आये हो तो टैक्सी से जाओ वर्ना ट्रेन में तो परेशान हो जाओगे। फिर भी हमने ट्रेन में जाना ही उचित समझा।

हम लोगों को बेलापुर स्टेशन से ट्रेन पकड़नी थी और कांजुर मार्ग स्टेशन तक जाना था। बेलापुर स्टेशन पर हम लोग ट्रेन की प्रतीक्षा कर रहे थे। हमने सुना था कि ट्रेन में चढ़ने या उतरने की जरुरत नहीं है, बस खिड़की के सामने खड़े हो जाना सब अपने आप हो जायेगा। हम लोग प्लेटफार्म पर खड़े थे लेकिन वो भीड़ दिख नहीं रही थी जिसकी हमें आशा थी। प्लेटफार्म खाली खाली सा देखकर अच्छा ही लगा। थोड़ी देर के इंतजार के बाद ट्रेन आई, और ना जाने कहाँ से भीड़ भी टपक पड़ी। पलक झपकते ही हम ट्रेन के अंदर थे। हमें चढ़ने के लिए सच में कोई मेहनत नहीं करनी पड़ी थी। वो तो हम धक्का मुक्की कर अंदर की तरफ सरक गए, वर्ना अगले स्टेशन तक शायद दूसरी खिड़की से बाहर भी निकाल दिए गए होते। इतनी भीड़ थी कि अगर हम अपने दोनों पैर उठा भी लेते तो ज्यों के त्यों खड़े रहते।

मैंने वहीं खड़े एक व्यक्ति से पूछा - भैया, हर रोज इतनी ही भीड़ होती है क्या?

उसने कहा - आज कम है।

"हैं!!! कम है?"

"आज सबको छुट्टी है ना, इसलिए कम भीड़ है।"

"अरे बाप रे बाप!!!"

हम लोग कुर्ला स्टेशन पर उतरे जहां से हमें कांजुर मार्ग स्टेशन की ट्रेन पकड़नी थी। उधर जाने वाली ट्रेन में कोई ख़ास भीड़ नहीं थी, बल्कि हमें तो बैठने को जगह भी मिल गई थी। हम जिस डिब्बे में थे उसमे बहुत कम लोग थे, अधिकतर सीटें तो खाली ही पड़ी थी। कोई २-४ लोग फिर भी खिड़की में खड़े होकर यात्रा कर रहे थे। लोकल ट्रेन में लोग सीट पर बैठने से ज्यादा खिड़की पर खड़े होना पसंद करते हैं। मैंने भी एक बार खिड़की में खड़े होकर यात्रा की, तब इस बात का राज समझ आया। ठंडी ठंडी हवा जब चेहरे को छुए और दूर दूर तक मुंबई के हसीं नजारे देखने को मिले तो कौन सीट पर बैठना पसंद करेगा। कुर्ला से कांजुर मार्ग का सफर कुछ ही देर का था पर उस बीच मैंने उन बच्चों को देखा जो मुझसे बिना कुछ बात किये एक गहरी सीख देकर गए।

मैं अपनी ही किसी सोच में बैठा था। तभी करीबन ६-७ साल का एक बच्चा उस डब्बे में चढ़ा। शायद एक मैली सी कमीज और नेकर पहने था। उसका हाथ पकडे उससे कोई २-३ साल बड़ा एक और बच्चा चढ़ा। वो भी कुछ ऐसे ही मैले कुचैले कपडे पहने था। उन दोनों के चढ़ने के पश्चात उनसे बड़ा एक और लड़का उनके साथ चढ़ा। उसकी उम्र कोई १४-१५ साल रही होगी। उसके हाथ में एक झाड़ू थी। वो उन दोनों बच्चों को एक सीट पर बैठाकर डिब्बे में झाड़ू लगाने लगा। वहां लगभग हर व्यक्ति उनकी तरफ देख रहा था। कोई कोई तो उनकी तसवीरें भी खींच रहे थे। शायद हर किसी के मन में उनके लिए दया भाव था। वो लड़का हर किसी के पैरों के पास से झाड़ू लगता और हाथ फैला कर पैसे मांगने लगता। कोई उसे रुपया दो रुपया देता तो कोई नहीं भी देता था। वो अपना काम किये जा रहा था।

मैंने भी उसे कोई २ रुपये दिए होंगे। मैं अक्सर किसी को भीख नहीं देता। लेकिन अक्सर ऐसे लोग मिल ही जाते हैं जो गाकर, बजाकर या फिर जैसे ये बच्चा झाड़ू लगाकर पैसे मांग रहा था। तब पता नहीं क्यों लेकिन मैं उन्हें जरूर ही कुछ का कुछ दे देता हूँ। वो सबके पास एक बार चक्कर लगा चुका था और फिर अपने छोटे दोस्तों, या शायद उसके भाई होंगे, उनके पास जाकर बैठ गया। उसने मिले हुए पैसे सम्भाल कर रख लिए। अगले स्टेशन पर वो अपने भाइयों को बड़े ही ध्यान से उतारकर उतरा। शायद वहां से किसी दूसरी ट्रेन के किसी डिब्बे में फिर से चढ़ा होगा।

मैं उसके बारे में काफी देर तक सोचता रहा। पिद्दी सा बच्चा था वो। उसकी उम्र में शायद मैंने अपने आप से नहाना भी नहीं सीखा था। वो टिंगू सा बच्चा अपने दो दो भाइयों की जिम्मेदारी सम्भाले दिन भर पचासों ट्रेनों में चढ़ता उतरता होगा। उसके माँ बाप ने उसे तो भेजा ही लेकिन उन दो नन्हे से बच्चों को क्यों भेजा? या फिर उनका इस दुनिया में कोई नहीं था? तो फिर वो बच्चे कैसे रहते होंगे? क्या वो छोटू अपने बड़े भाई से खिलौनों की जिद्द करता होगा या उसकी परेशानी समझता होगा? और वो मंझला, वो भी तो नए कपड़े लेने की जिद्द करता होगा या वो भी अपने भाई जितना ही जिम्मेदार बच्चा था? वो खुद, उसे भी अच्छा अच्छा, तला हुआ, नमकीन, महंगा खाने का मन करता होगा या नहीं? वो दिनभर कमाएं चंद सिक्कों में कैसे गुजर करते होंगे?

इन सब सवालों ने मुझे झकझोर के रख दिया था। कुछ देर बाद मैं खुद मेरे ही सवालों के दायरे में खड़ा हो चुका था। क्या मैं खुद अपनी जिम्मेदारियां निभा रहा हूँ या उन्हें छोड़कर भागता फिरता हूँ? वो बच्चे, जिन्हे शायद उन सिक्कों से प्यारा और कुछ नहीं था, जाने मेरे जैसे कितनों के लिए ही एक सबक दे कर गए होंगे। मैंने २ रुपये देकर उनकी कोई मदद नहीं की थी। मैं तो खुद को उन बच्चों की मदद करने के लायक भी नहीं समझता। मैं, जो खुद की मदद नहीं कर सकता, किसी और की क्या मदद करूंगा। वो बच्चा मुझे २ रुपये के बदले एक अनमोल सीख दे गया।

3 comments:

  1. So happy to see you observing your surroundings carefully and learning the best lessons of your life from it !!

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  2. Beautifully elaborated. :) Need more such articles. :)

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