Tuesday, February 16, 2016

सोच

सुशीला ने सुबकते हुए कहा - इसमें... मेरी... क्या... गलती है, माँ?

उसकी माँ ने प्यार से उसके सर पर हाथ फेरते हुए कहा - तेरी कोई गलती नहीं है मेरा बच्चा, लेकिन ये जो लोग बातें बनाते हैं उन्हें चुप तो नहीं कर सकते ना। और सुन, अपने ससुराल वालों के सामने कुछ मत कहिओ।

सुशीला ने ना चाहते हुए भी, सिर्फ अपने माँ बाप के मान सम्मान की खातिर शादी कर ली थी। ऐसा नहीं था कि उसे अपने माँ बाप की पसंद से ऐतराज था, लेकिन शादी से पहले वो अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती थी। वो आधुनिक ज़माने की लड़की जरूर थी, लेकिन अपने माँ बाप की पुरानी विचारधारा का सम्मान करती थी। वो अक्सर अपने दोस्तों से कहती थी - अपने शौक़ के लिए माँ बाप से जिद्द करना हमारा हक़ है, लेकिन उन्हें दुःख पहुँचाकर किया गया काम गलत है।

अपने कमरे से ही टीवी देखते हुए उसकी सास चिल्लाई - अरे ओ महारानी, आज खाना मिलेगा या नहीं?

वो अपनी सास के कमरे में आकर बोली - वो आने वाले हैं मम्मी, फिर बनाती हूँ।

सास ने चिढ़कर कहा - दुबारा चूल्हा जला लेगी तो कौनसा तेरे हाथ घिस जायेंगे।

वो दौड़ कर रसोई में गयी, उसकी आखों में आंसू थे। कहाँ वो अपने माँ बाप की लाड़ली, हमेशा हंसती खेलती रहती थी, सबको खुश रखती थी, और कहाँ ससुराल में उसे छुप - छुप कर रोना पड़ता है। कहाँ उसकी हंसी की एक खिलखिलाहट अनमोल थी और कहाँ उसके आंसुओं की भी कीमत नहीं रही।

शादी से पहले मेरी सास कितना लाड़ करती थी, जाने किस कलमुही ने शादी के दिन कान भर दिए कि अब वो जली कटी सुनाने का एक भी मौका नहीं छोड़ती। आखिर मुझसे ऐसा कौनसा पाप हो गया था, यही कि मैंने नौकरी कर ली, या मुझ पर गन्दी नीयत रखने वाले मेरे बॉस को सबक सीखा दिया। सब कमबख्त नौकरी करने की वजह से हुआ, एक कॉर्पोरेट कंपनी के चक्कर में मेरी हंसती खेलती जिंदगी जहर बन गयी। जाने ये बड़ी कम्पनी के ऊँचे ओहदे वाले के कर्मचारी अपने आप को क्या समझते हैं। सिर्फ पैसा ही इनके लिए सबकुछ है। अपने दिल में इंसानियत तो रत्ती भर भी नहीं रखते।

वो अपनी सास के लिए खाना बना ही रही थी कि इतनी देर में उसका पति भी आ गया। अपनी माँ के कमरे में जाने के बाद वो सीधा रसोई की तरफ गया। सुशीला के कंधे पर हाथ रखकर बोला - कुछ मदद करूँ तुम्हारी?

उसने अपने दोनों हाथों से रमेश के हाथ पकडे और उसे रसोई के बाहर ले जाते हुए बोली - नहीं जी, आप कपड़े बदलिये तब तक मैं खाना लगाती हूँ।

रमेश का स्वभाव बिलकुल सुशीला के ही जैसा था। उसकी किस्मत अच्छी थी कि उसे रमेश जैसा पति मिला, जो उसे खुश रखने की हर संभव कोशिश करता है। एक छोटी ननद थी लेकिन वो भी अपने मामा जी के यहाँ रहकर पढाई कर रही थी। दिन भर घर पर सिर्फ वो और उसकी सास रहते थे।

एक परिवार में खुश रहने के लिए सिर्फ किसी एक का प्यार ही काफी नहीं होता। अगर परिवार में कोई एक जन भी नफरत की नजर से देखे तो घर काटने को दौड़ता है। इंसान दुखी रहता है क्युकिँ वो खुद को मिलने वाली नफरत को ज्यादा महत्व देता है। उसे तो वो नफरत उसकी सास से, जिसे वो माँ समझकर घर में आई थी, मिली थी। 

सुशीला खाने की टेबल लगा चुकी थी। सभी खाने के लिए बैठ गए थे। तीनो चुप चाप खाना खा रहे थे। घर में एकदम ख़ामोशी थी। रमेश को शांत माहोल पसंद था, लेकिन इस ख़ामोशी से वो डरता था। उसे मालूम था कि उसकी माँ सुशीला को बिलकुल पसंद नहीं करती थी। लेकिन रमेश हर वो कोशिश करता के उसकी माँ की सुशीला के प्रति जो नफ़रत है वो प्यार में बदल जाए। 

उस ख़ामोशी को तोड़ने के लिए रमेश ने अपनी माँ की तरफ चेहरा घुमा कर कहा - माँ, सुशीला ने आज कितना अच्छा खाना बनाया है ना?

उसकी माँ ने ताना कसते हुए कहा - क्या खाक अच्छा बनाया है, घर के कामों में मन कहाँ लगता है महारानी का।

उसने उसी लहजे को बरक़रार रखते हुए कहा - क्यों इस बेचारी को हमेशा डांटती है।

उसकी माँ ने कहा - तू बड़ा इसकी तरफदारी कर रहा है। शादी के बाद अपनी माँ का होश ही कहाँ तुझे।

सुशीला ने बड़ी मुश्किल से अपने आंसुओं को रोका हुआ था। सब्जी परोसते परोसते उसका हाथ जल गया, वो हल्का सा कराही।

उसकी माँ ने फिर ताना कसा - लो अब मैडम का नाटक शुरू हो गया।

रमेश अपनी आवाज को थोड़ा तेज कर के बोला - तू हमेशा इसको खरी खोटी सुनाती रहती हैं माँ, क्या बिगाड़ा है इसने तेरा? तुम्हारे कहने पर इसने दुबारा जॉब नहीं की, घर के सब काम करती है, तुझे किसी काम को हाथ तक नहीं लगाने देती।

उसकी माँ ने झुंझलाते हुए कहा - यही ना वहां मटक मटक के चलती होगी, तभी तो उस कंजर की नीयत डोली।

रमेश ने अपनी आवाज धीमे करते हुए कहा - माँ कल को ये सब अपनी निक्की के साथ हो तो क्या तू तब भी निक्की को दोष देगी। हमे तो गर्व होना चाहिए सुशीला पर, कि पैसो की तंगी होते हुए भी, अपनी नौकरी की परवाह ना करके इसने अपने बॉस को करारा जवाब दिया।

उसकी माँ ने फिर कहा - तो फिर शादी से पहले ये बात छुपाने की क्या जरुरत थी, कुछ तो इसकी भी गलती होगी तभी तो इसकी माँ ने हमसे ये बात छुपाई।

रमेश ने अपनी माँ के हाथ पर हाथ रखा और प्यार से बोला - इसने मुझे बताया था, माँ।

उसकी माँ चौंक गयी, कुछ देर उसे और सुशीला को देखा और फिर बोली - तो तूने मुझे क्यों नहीं बताया?

इस बार रमेश की आवाज में थोड़ा दर्द था, वो बोला - माँ, सुशीला तुझे बताना चाहती थी, मगर इसे मैंने मना कर दिया था। अगर हम तुम्हे बताते तो तुम समाज के डर से हमारी शादी नहीं करवाती। मैं सुशीला जैसे जीवन साथी को खोना नहीं चाहता था।

उसकी माँ ने रमेश को डांटते हुए कहा - चल भाग के अंदर से मंजन लेकर आ। मेरी बेटी का हाथ जल रहा है।

सुशीला की सास और वो एक दूसरे को देख रहे थे। दोनों के आँखों में आंसू थे।

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