Tuesday, January 26, 2016

गणतंत्र दिवस

"भगतु, रामु, जल्दी जल्दी चलो ना", आजाद ने पीछे मुड़कर आवाज लगाई।

भगत, राम और आजाद, तीनो हम उम्र और बहुत ही गहरे मित्र थे। ये लोग अपने बचपन को ही जी रहे थे, लेकिन फिर भी दुनियादारी से अच्छी तरह वाकिफ थे। ये तिकड़ी भले ही पाठशाला ना जा पाती हो, लेकिन पढाई और देश के प्रति इनका बहुत ही लगाव था। इसीलिए तो इन्होने अपना नाम देश के वीर क्रांतिकारियों के नाम पर रख लिया था।

ये लोग कबाड़ इकठा करने का काम करते थे और जो कुछ दिन भर में जमा होता था वो शाम को नुक्कड़ वाले कबाड़ी झुमरू दास की दुकान पर दे देते थे। वहीं नुक्कड़ पे ठीक झुमरू दास की दुकान के सामने एक पाठशाला थी। तीनों हर सुबह राष्ट्रगान वक़्त पाठशाला के सामने पहुँच जाया करते थे।

"जय हो, जय हो, जय हो।"

"जय जय जय जय हो।"

राष्ट्रगान एक समाप्त होने के बाद ही उनके दिन की शुरुआत होती थी।

उनके मन में गणतंत्र दिवस का पूरा उत्साह था। उन्होंने अपने सेठ झुमरू दास से अपने देश के राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा बेचने की आज्ञा ले ली थी।

"भैया, लो ना, सिर्फ पांच रुपये का ही है।"

"दीदी, आपके ऑफिस की सजावट के लिए खरीदिए ना।"

उनकी आवाज में उनके छुटपन की एक मासूमियत झलकती थी। उनका उत्साह और भी बढ़ जाता था जब कोई उनके सर पर प्यार से हाथ रख कर जाता था। उनके माँ बाप की जो कमी उन्हें काटने को दौड़ती थी, वो कुछ अनजाने लोगो का आशीर्वाद पाकर पूरी हो जाती थी। भले ही उन्हें अपनी जिंदगी से कुछ ना मिला हो, लेकिन उन्हें जिंदगी से कोई शिकायत भी नहीं थी।

"भैया, तिरंगा लो ना",  आजाद ने चाय वाले की रेहड़ी के पास खड़े एक लड़के से कहा।

"नहीं चाहिए छोटे।"

"भैया, पांच रुपये की तो बात है।"

"बोला ना छोटू, नहीं चाहिए।"

"ले लो ना भैया, अपनी बाइक पर लगाना, अच्छा लगेगा।"

"किस ख़ुशी में लूँ? यहाँ के लोगों ने, नेताओं ने देश की हालत बिगाड़ कर रखी है।"

"लाइटर देना भैया", लड़के ने चाय वाले को कहा।

एक फटेहाल कपड़ो में एक छोटा सा बच्चा उन लोगो के पास आया। एक हाथ से अपनी नाक खुजाते और दूसरे से उनके हाथों पे लटके झंडों की ओर इशारा करके कहा, "भैया, मुझे एक वो दो ना।"

"छोटू, ये तिरंगा है, अपने भारत देश का झंडा। ये ले मैं तेरी जेब पर लगा देता हूँ।", राम ने उस बच्चे को दुलार करते हुए कहा, "देख कितना प्यारा लग रहा है।"

"भैया जरा वो वाले बिस्किट देना", भगत ने चाय वाले से कहा।

उन्होंने उस बच्चे को बिस्किट दिए और कुछ देर तक लाड़ भी किया। बच्चा काफी खुश होकर उछलता कूदता चला गया। वो तिकड़ी भी अपने उत्साह को कायम रखते हुए झुमरू दास की दुकान पर पहुंचे।

"अरे आ गए तुम लोग, ये लो तुम्हारे स्कूल के कुछ दोस्त तुम लोगों के लिए मिठाई दे कर गए हैं और तुम्हे बुलाया भी है।"

"हमारे दोस्त!!!", तीनो आश्चर्यचकित थे, "भला आजतक हमारी तो कभी किसी से बात नहीं हुई।"

तीनो पाठशाला में पहुचें जहां पर उनके ही उम्र के कुछ बच्चे उनका इन्तेजार कर रहे थे। उनके प्रवेश करते ही बच्चे खुश हो कर उनकी तरफ दौड़े आये और उन तीनों की बाँह पकड़ कर मुख्याध्यापक के कक्ष में ले गए।

"तुम तीनो हर सुबह बाहर खड़े होते हो, क्यों?"

"सर, हमे स्कूल अच्छा लगता है।"

"तो पढाई करने क्यों नहीं आते?"

"कैसे आएं सर, पेट भरने जितना ही तो कमा पाते हैं।"

"कल से तुम स्कूल आओगे।"

"लेकिन सर....."

"तुम्हारे सारे खर्च की जिम्मेदारी अब स्कूल की है। बोलो अब स्कूल आओगे के नहीं?"

"आएंगे सर", तीनों ख़ुशी से चिल्लाये।

"शाबाश, चलो अभी तुम लोगो को गणतंत्र दिवस के अवसर पर राष्ट्रगान गाना है।"

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