Sunday, January 10, 2016

आज फिर मैं अंधेरे में घर आया हूँ...

जाने कितनों का दिल दुखा कर आया हूँ,
आज फिर मैं अंधेरे में घर आया हूँ।

ढकेल रहे हैं कुछ लोग अपने जीवन को रस्तों पर,
और एक मैं हूँ, जो सिनेमा देख कर आया हूँ।

जिन्दगी को जीतने के मन से निकला था,
जिन्दगी के हाथों मुंह की खाकर आया हूँ।

माँ के आशीर्वाद सा साहस कहीं भी जाकर नहीं मिला,
मैं हर धर्म के आगे शीश झुका कर आया हूँ।

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