Thursday, May 8, 2014

रिक्शा

सुबह सुबह अपने दफ्तर जा रहा था| अचानक माहौल धीमा सा हो गया| अचानक एक रिक्शा दिखा| रिक्शे में वो थी| हवायें उसके बालों को धीरे धीरे सहला रही थी| मैं उसे देखता रहा| बस देखता ही गया| वक़्त बिलकुल थमता सा नजर आ रहा था| अचानक रिक्शा चली गयी और समय ने फिर से रफ़्तार पकड़ ली| मैं भी तेज तेज दफ्तर की तरफ हो लिया|

दफ्तर पहुचनें से कुछ पल पहले ही वो रिक्शा फिर दिखी| और रिक्शा में वो| पर अबकी बार वक़्त ठहरा नहीं था| सब अपनी रफ़्तार के बराबर हो रहा था|

फिर मैंने अपना दिमाग लड़ाया और सोचा की ये कैसे हो सकता है| वक़्त इसलिए थम गया था क्योकिं वह ट्राफिक था|

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