Wednesday, April 2, 2014

बिन बुलाई बारात

संकेत, मेरा नाम है, अच्छा है ना| हो भी क्यों ना, आखिर घरवालों ने बड़े प्यार से रखा है भई| मैं अपने माँ बाप की इकलौती औलाद हूँ, इसलिए लगाव कुछ ज्यादा ही है| आज तक उन्होंने मेरी कोई बात नहीं टाली, कोई तो कैसे टालते मेरी जिंदगी की सबसे खास बात को ही नहीं टाला| कौनसी खास बात, अरे मेरी शादी की| अब आप सोच रहे होंगे की शादी में कौनसी खास बात, आजकल तो लव मैरिज के लिए लगभग घरवाले मान ही जाते है| पर ना जी ना, मेरी शादी कुछ खास ही थी| कैसे? तो सुनिए :

मैं संकेत, नाम तो ऊपर बता ही दिया ना| मैंने ऍम.ए. में एक विश्वविधालय में दाखिला लिया| मेरी क्लास में लगभग सबसे अच्छी दोस्ती हो गयी थी| सिर्फ एक को छोड़कर, जी हाँ, क्यूंकि उसे मैं पसंद करने लगा था| मैं उसे अपना स्पेशल दोस्त बनाना चाहता था, इसलिए उससे कभी बात ही नहीं कर पाया| मैं उससे अपने प्यार का इजहार करना चाहता था पर हिम्मत ही नहीं पड़ रही थी| मैं उसे अकेले में ही अपनी मोहब्बत के बारे में बताना चाहता था| पर वो हमेशा अपनी सहेलियों के साथ ही रहती थी और मैं भी अपने दोस्तों की मण्डली में ही रहता था| वैसे तो सारी क्लास ही मेरी दोस्त थी पर कुछ दोस्त ऐसे थे जिनके साथ मैं हमेशा रहता था| लेकिन मेरे दोस्तों को बिलकुल भी अंदाजा नहीं था कि मैं किसी से प्यार भी करता हूँ और मैंने भी उनके सामने कभी जाहिर नहीं किया|

एक दिन मैंने श्रुति को अपने प्यार का इजहार करने का पूरा मन बना लिया था| उस दिन मौका दूंढ रहा था की कब वो अकेली हो और उसे बताऊं कि मैं उसे कितना चाहता हूँ| मेरी मित्र मण्डली पार्क में बैठी थी| मैं दोस्तों से छुट्टी लेकर क्लास की तरफ आया| क्लास में आके देखा तो सबके बैग तो वहीँ थे पर कमरे में कोई नहीं था| मुझे एक तरीका सूझा| मोबाइल का जमाना है तो उसके पास भी मोबाइल होना स्वभाविक होगा| मैंने एक पर्ची काटी, उसमे अपना नंबर लिख कर उसके बैग में डाल दी| अब तो मैं बस उसके फ़ोन का ही इंतेजार कर रहा था| मेरा हाथ बार बार मेरी उसी जेब की तरफ जाता जिसमे अपना मोबाइल रखा हुआ था| हर थोड़ी देर में जेब से मोबाइल बाहर निकाल कर देखता रहता कहीं उसका फ़ोन तो नहीं आया|

मैं उसके फ़ोन के इंतेजार में बेचैन होता जा रहा था| अपने दोस्तों के साथ बैठा हुआ होता तो उनकी बातों से ज्यादा ध्यान मेरा मोबाइल की तरफ होता था| पूरा हफ्ता बीत गया पर उसका फ़ोन नहीं आया| उस दिन इतवार था| मैंने तय कर लिया था की अगर आज उसका फ़ोन नहीं आया तो मैं कल उसे सबके सामने ही इजहार करूंगा| उस शाम को अचानक मेरे मोबाइल की घंटी बजी| मैंने देखा तो नया ही नंबर था| मैंने उसे जो कहना था उसका रट्टा लगा के बड़ी हिम्मत करके फ़ोन उठाया|

“हेल्लो”, मैंने कांपती हुई आवाज में बोला|

“हेल्लो”, लड़की की आवाज आई|

मैं खुश हो गया, आखिर उसका फ़ोन आ ही गया| फिर भी मैंने थोडा सब्र रखा और एक बार पूछ कर यकीन कर लेना चाहा की वो ही है|

“कौन”, मैंने पूछा|

“मैं रिंकी पर तू कौन और मेरे बैग में ये पर्ची डालने का क्या मतलब है”, उसने गुस्से में पूछा|

“ओह तेरी, तो वो तेरा बैग था| सॉरी हाँ, किसी और बैग चक्कर में तेरे बैग में डल गयी, सॉरी रिंकी”, मैंने माथा पीटते हुए कहा|

“तू संकेत है क्या?”, उसने सवाल किया|

“हाँ यार”, मैंने कहा|

“ओये अगर ऐसे लीचड़ वाले काम करेगा तो कोई लड़की तेरे से बात नहीं करने वाली, प्यार की तो भूल ही जा”, वो बोली|

“तूने भी तो फ़ोन किया ना”, मैंने कहा|

“ये तो तू निकला बेटा वर्ना कल तेरी अच्छे से झंड होती”, वो बोली|

“यार तू ना किसी को बताइयो मत, प्लीज”, मैंने थोडा गिडगिडाते हुए कहा| मैं अपनी बात को राज रखना चाहता था|

“वैसे जरा बतायेगा तू ये किसके बैग में डालने वाला था”, उसने पूछा|

“श्रुति के बैग में”, मुझे ना चाहते हुए भी उसका नाम बताना पड़ा|

“ठीक है, नहीं बताउंगी, तू कर लियो कोशिश”, उसने कहा|

“सॉरी यार तुझे मेरी वजह से परेशान होना पड़ा”, मैंने उससे माफ़ी मांगी|

“बस बस, अब ड्रामे ना कर| तुझसे दोस्ती की है तो भुगतना भी पड़ेगा ही”, उसने हँसते हुए कहा|

रिंकी मेरी अच्छी दोस्त थी इसलिए मैं अगले पिटने से बच गया| अगले दिन वो मुझसे मिली तो मुस्कुरा दी|

मैं उसके पास गया और पूछा, “एक बात तो बता तुझे इतने दिन बाद मेरी वो पर्ची दिखी|

“इतने दिन बाद मतलब, कब रखी थी”, उसने हैरानी से पूछा|

“एक हफ्ता पहले रखी थी”, मैंने कहा|

“हा हा हा, तब तो तूने पर्ची सही जगह फिट की थी”, उसने कहा|

“मतलब”, मैंने हैरानी से पूछा|

“मतलब की तूने पर्ची तो उसी के बैग में रखी थी| पर जिस किताब में रखी थी, वो किताब मेरी थी| मुझे अगले दिन ही उसने वो वापिस कर दी थी, शायद उसने वो पर्ची देखी नहीं”, उसने कहा|

“अरे बाप रे बाप!!!!!”, मैं तो हैरान रह गया|

एक तो पूरा हफ्ता बेचैन रहा उस पर सब उल्टा पड़ गया| मैं भी हिम्मत हारने वाला नहीं था| मैंने ये पर्ची वाला तरीका एक बार फिर इस्तेमाल करने का सोचा| मैं दोस्तों के साथ जब भी पार्क में बैठा होता था तो उनसे नजर बचाके पर्ची डालने का मौका ढूंढने क्लास का चक्कर लगा के आता था| आखिर एक और मौका मिल ही गया| अबकी बार मैंने पूरा प्रेम पत्र लिखा था| मैं उसके बैग में पत्र रखकर बाहर आ रहा था|

“श्रुति”, मैं श्रुति को देखकर चौंक पड़ा|

“क्या कर रहा था ओये तू मेरे बैग के पास”, उसने पूछा|

“कुछ नहीं, मैं वो, मैं..”, मैं घबराते हुए बोला| मुझे लगा था कि मैं तो गया काम से|

“देखूं तो मैं भी जरा”, वो कहके अपने बैग की तरफ गयी|

मैं वही बुत बनकर खड़ा रहा|

“ओहहो, तो जनाब ने चिठ्ठी लिखी है”, वो चिठ्ठी से हवा करते हुए नौटंकी की तरह बोली|

“तूने पढ़ तो लिया ही है| अब अपना जवाब भी दे ही दे”, मैं शरमाते हुए कहा|

“ज्यादा शर्माने की जरूरत नहीं है, अगली बार ऐसा हुआ ना ये चिठ्ठी का जवाब फिर प्रिंसिपल सर ही देंगे|”, उसने गुस्से से कहा और बाहर की तरफ जाने लगी|

“पर रुक तो, सुन, तुझे शादी तो किसी ना किसी से करनी ही है, तो मुझमें क्या कमी है”, मैं उसके पीछे चलते चलते हुए बोला|

“दिमाग की कमी है घोंचू”, उसने मजाक उड़ाया और चली गयी|

मैंने तो ठान लिया था की अब बोल तो दिया है तो पूरी तरह से कोशिश करूँगा| अब तो उसको भी पता चल गया था| रिंकी उसके पड़ोस में ही रहती थी, और उसकी अच्छी दोस्त भी थी| अब तो वो मेरी भी अच्छी दोस्त बन चुकी थी| मैंने सोचा क्यों ना उसका साथ लिया जाए|

“नहीं, नहीं, मैं ये नहीं करने वाली, मुझे तेरी ये ड्रामेबाजी के अलावा और भी बहुत काम है”, रिंकी बोली|

मैं उसे मना रहा था ताकि वो मेरी मदद कर सके|

“प्लीज यार, मान जा ना, दो दिलों को मिलाना पुण्य का काम होता है”, मैंने फ़िल्मी डायलॉग मारा|

“दो नहीं एक, तू ही लट्टू है उसपे वो तो तुझे भाव तक नहीं देती”, वो मजाक उड़ाते हुए बोली|

“कर दे ना मदद, फिर मैं तेरा दूल्हा ढूंढने में तेरी मदद करूंगा और तेरे लिए प्यारा सा बन्ना ढूढेंगे”, मैंने मजाक में कहा|

“जा जा, मेरी अक्कल अभी तक ठिकाने पे ही है| चल ठीक है, तू दोस्त है तो तुझ पर थोड़ी बहुत किरपा तो कर ही सकती हूँ| लेकिन क्या मदद चाहिए ये तो बता”, उसने पूछा|

“देख तू उसके पड़ोस में ही रहती है ना, तो बस उसके साथ कहीं भी जाए तो मुझे साथ बुला लियो”, मैंने कहा|

“तुझे क्या लगता है ऐसे लफंटरगिरी से वो तुझे पसंद करने लगेगी| ऐसे तो वो मुझसे भी लड़ पड़ेगी”, उसने कहा|

“तो फिर तू ही बता ना क्या करू”, मैंने कहा|

“उसको सताने से अच्छा है, उससे दोस्ती बढ़ा| अगले हफ्ते अपना कॉलेज का चार से पांच दिन का टूर है, वो पक्का जाएगी तो तू भी चला जाइयो, वहां तेरी उससे अच्छी दोस्ती भी हो जाएगी”, उसने सुझाया|

“हाँ यार, बात तो तेरी एकदम सही है| आज ही टूर पे जाने का जुगाड़ बनाता हूँ”, मैं बोला|

टूर से दो दिन पहले ही पता चला की शादी पे जाना है| मुझे टूर का विचार ही रद्द करना पड़ा| मैं अगले दिन कॉलेज में रिंकी से मिला|

“कल मैं टूर पे नहीं जा पाउँगा”, मैंने कहा|

“क्या, पर तेरी तो जाने की पूरी तैयारी थी| अब क्या हुआ”, उसने हैरान होकर पूछा|

“घरवालों के साथ शादी में जाना है, तू मेरा एक काम तो कर ही सकती है, बस मुझे फ़ोन पे उसके बारे में बताती रहियो”, मैंने कहा|

“मैं खुद भी टूर पे नहीं जा रही”, उसने कहा|

“क्यूँ, कल तक तो तेरी जाने की पूरी तैयारी थी”, मैंने पूछा|

“हाँ, पर, मेरे घर में मेहमान आने वाले है, तो मुझे घर ही रहना है”, उसने कहा|

“कौन सा तेरे रिश्ते वाले आ रहे है, तू तो जा ही सकती है”, मैंने मजाक में कहा|

“क्या पता रिश्ते वाले ही हो, घरवालो ने मेरा दूल्हा ढूंढ ही लिया हो”, उसने भी तपाक से कहा|

“हाय, अभी से पहले शादी, इतना जुल्म वो भी मासूम सी जान पर”, मैंने कहा|

“तू क्यों टेंशन में आ रहा है, तेरे को भी तो तेरी श्रुति से शादी करने की आग लग रही है”, उसने कहा|

“अगर वो मना कर गयी तो फिर मैं तेरे घर ही आऊंगा रिश्ता लेके”, मैंने कहा|

“जा जा, तेरे जैसे छिछोरे से मैं तो शादी बिलकुल नहीं करू”, उसने कहा|

और हम दोनों ठहाका मारकर हंस पड़े|

कॉलेज के दिन गुजरते गए| मेरी श्रुति से अच्छी दोस्ती हो गयी थी| मैंने उसे एक बार फिर शादी के लिए इजहार किया|

“श्रुति, यार आज आखरी परीक्षा है, फिर हम कभी नहीं मिल पाएंगे| मुझे आज कुछ कहना है”, मैं बोला|

“हाँ बोल ना, तेरी बात तो सुननी ही पड़ेगी”, उसने हँसते हुए कहा|

“मुझसे शादी करेगी”, मैंने अपना हाथ उसकी और बढ़ा के कहा|

“हद्द है यार, तू अभी तक नही सुधरा”, उसने अपने माथे पे हाथ मारकर कहा|

“अरे बता ना प्लीज, आज मैं मजाक के मूड में नहीं हूँ”, मैंने कहा|

“पर मुझे तो तेरी शकल देखते ही हंसी आ जाती है”, कहकर वो हँसने लगी|

“यार बता ना प्लीज, ऐसा ना कर”, मैंने फिर कहा|

“श्रुति”, उसकी सहेली की बाहर से आवाज आई| और वो मेरी तरफ अलविदा का इशारा करके चल गयी|

“और मिस्टर छिछोरे, क्या रहा फिर तेरा”, रिंकी अंदर आते हुए बोली|

“तूने सुन तो लिया ही होगा, फिर क्यूँ मेरे मजे ले रही है”, मैंने चिढ़ते हुए कहा|

“हाँ हाँ, सुन लिया, इतना भड़कता क्यों है, ये नहीं कोई और सही”, वो बोली|

“हा हा हा, जरुर अब तो तेरे घर ही रिश्ता लेके आना पड़ेगा”, मैंने मजाक में कहा|

“हाँ आ जइयो, मेरी माँ तेरी हड्डी पसली एक कर देगी”, उसने कहा|

“कोई ना, कोई ना, सासु माँ के हाथ की मार भी खा लेंगे”, मैंने मजाक में कहा|

“आज आखरी दिन है, चल कुछ पार्टी करते हैं”, उसने कहा|

“हाँ चल भूखी, तुझे तो आज मैं खिलाता हूँ”, मैंने हँसते हुए कहा|

कॉलेज के दिन भी ख़तम हो गए| मेरी रिंकी से अक्सर फोन पे बातें होती रहती थी| मैं श्रुति के बारे में पूछता रहता था| लेकिन मेरे मन में उथल पुथल सी थी कि श्रुति ने अगर हाँ नहीं कहा था तो मना भी तो नहीं किया था| मैं कोई अच्छा सा मौका देखकर घरवालों से इस बारे में बात करना चाहता था| एक दिन माँ अच्छे मूड में मिल गयी|

“माँ, एक बात बतानी थी”, मैंने कहा|

“हाँ, मेरा लाल, बोल ना”, माँ ने कहा|

“तू गुस्सा तो नहीं होगी ना”, मैंने कहा|

“इतना शर्मा क्यों रहा है, नहीं होउंगी गुस्सा, तू बता”, माँ ने सर पे हाथ फेरकर पूछा|

“माँ, मैंने तेरे लिए बहु पसंद कर रखी है”, मैंने कहा|

“अरे वाह, इसमें शर्माने की क्या बात है, चल फिर कल उनके घर चलते है”, माँ ने पूछा|

“माँ, जहाँ तक मेरा विचार है वो मान तो जायेंगे ही, तो क्यूँ ना हम कुछ अलग करे”, मैंने पूछा|

“हाँ जरुर, जैसा तू कहे”, माँ ने कहा|

मैंने माँ, पापा को अपने विचार के बारे में बताया| माँ पापा मान तो गए पर बड़ी मुश्किल से माने| मैंने बात ही कुछ ऐसी कही थी| मैं श्रुति के घर रिश्ता नहीं बारात लेके जाने वाला था| मैंने रिंकी को फ़ोन किया|

“हेल्लो रिंकी, कैसी है”, मैं उसके बोलने से पहले ही बोल उठा|

“ओहो छिछोरे, आज बड़ा उछल रहा है, क्या बात हो गयी ऐसी”, उसने पूछा|

“बस पूछ मत, तुझे मेरी एक और मदद करनी होगी, प्लीज मना मत करियो”, मैंने कहा|

“पहले कभी किया क्या? चल बता क्या काम है”, उसने पूछा|

“इस रविवार को तुझे श्रुति के घर रहना है| और पता कर दियो की उनके घरवाले कहीं बाहर ना जा रहे हो”, मैंने कहा|

“क्या बात, रिश्ता लेके आ रहा है क्या?”, उसने हैरानी से पूछा|

“हा हा हा, तू बस मेरा कमाल देखती जा”, मैंने कहा|

“ठीक है, पर ये श्रुति को लेके आखिरी काम है”, उसने कहा|

“हाँ, मेरी माँ, इसके बाद कुछ नहीं कहूँगा”, मैंने कहा|

“ठीक है छिछोरे, अभी फ़ोन रख, लोगों को और भी बहुत काम होते है”, उसने कहा|

रविवार का दिन भी आ गया| मेरी बारात बड़ी धूमधाम से निकली| बारात उनके शहर भी पहुँच गयी| पर जो शादी इतनी अजब की थी तो बारात तो ग़जब की होनी ही थी| अब बिन बुलाई बारात थी तो पंगे होने भी स्वभाविक थे|

बारात धूमधाम से श्रुति के घर की ओर जा रही थी| मेरे भाई बन्धु, यार दोस्त और सारा परिवार नाचता हुआ जा रहा था| मेरे दोस्त पटाखे जला रहे थे| एक पटाखा अचानक एक दुकान के छप्पर पे जा गिरा| छप्पर था पोलिथीन का बना हुआ, उसमे आग लग गयी| हमारी तरफ से किसी का ध्यान नहीं गया| आसपास के दुकानदारों ने मिलकर आग बुझाई| फिर सभी दुकानदारों ने बारात रुकवा ली| सबका गुस्सा सातवें आसमान पर था| पापा,चाचा और मामा सबने मिलकर किसी तरह उनका गुस्सा शांत करवाया| अपनी शादी के दिन मेरी पिटाई होते हो/ते बच गयी| फिर थोड़ी और आगे बढ़े| रस्ते में शमशान पड़ता था| वहां किसी का अंतिम संस्कार करने लोग आये हुए थे| बारात फिर अपने मजे में रही थी| उधर शमशान में पूजा चल रही थी और इधर ढोल बज रहे थे| अंदर वाले सभी एक एक लाठी लेके गुस्से से बाहर आये|

“उतारो इस दुल्हे को नीचे, करवाते है इसका ब्याह”, उनमे एक बोला|

मुझे गले से पकड़ के घोड़ी से नीचे पटक दिया|

“मैं तो गया काम से”, मैंने मन ही मन सोचने लगा|

“भाई, क्या हुआ, हमने क्या बिगाड़ दिया”, पापा ने उनसे पूछा|

“तुम लोगों को दिख नहीं रहा अंदर पूजा हो रही है, हमारा बुढा गुजर गया तुम यहाँ ढोल पीट रहे हो”, उनमे से दूसरा बोला|

“माफ़ करना भाई हमने देखा नहीं, अब बारात को अगले मोड़ तक शांति से ले जायेंगे”, चाचा जी बोले|

“आज हमारे लड़के की शादी है, भाई जाने दो ना”, पापा जी ने हाथ जोड़ कर मिन्नत की|

खैर उन्होंने हमें जाने दिया| अब अगले मोड़ तक मैं खुद भी पैदल ही गया| मोड़ बहुत दूर था, रस्ते में जितने लोग दिखे सब मुझपर हंस रहे थे| जैसे तैसे हम थोडा और आगे बढ़े| मेरे ताऊ जी, थोड़े पियक्कड़ थे| उस दिन थोडा ज्यादा चढ़ा ली| फिर क्या था उन्होंने रौला पा दिया|

“उतारो इसको, घोड़ी पे मैं चढुंगा”, ताऊ जी नशे में टुन्न बोल रहे थे|

वो क्या है ना, मेरी ताई जी भी उसी शहर से ताल्लुक रखती है| तो ताऊ जी खुद घोड़ी चढके ताई जी के यहाँ बारात ले जाने की जिद्द पे अड़ गए| जैसे तैसे पापा, चाचा ने मिलकर ताऊ जी को समझाया|

“भाई ये अपने लड़के की शादी है, भाभी तो देखो वो नाच रही है”, पापा जी बोले|

“अच्छा, तो देख क्या रहे हो ढोल बजाओ मैं भी नाचूँगा”, ताऊ जी लगे नाचने|

मैं तो परेशान ही हो गया था| एक तो मेरा जुलूस इतना निकल चुका था ऊपर से शादी का भी कोई पता नहीं था कि होगी भी या नहीं| मैं मन ही मन प्राथना कर रहा था कि बस श्रुति के घर से कोई रस्ते में ना मिल जाये| जैसे तैसे हम श्रुति के घर  वाली गली पहुँच ही गये| वहां सब अपने घर से बाहर निकल आये| सब की शकल हैरान सी नजर आ रही थी, और हो भी क्यों ना वहां किसी घर में शादी की सजावट भी तो नहीं थी| मेरी नजर तो श्रुति के घर की तरफ थी| वो भी बाहर निकल के देखने आये थे| फिर मेरी नजर श्रुति से मिली|

उसके चेहरे से ही उसकी हैरानी का पता चल रहा था| मैं उसे देखकर मन ही मन मुस्कुरा रहा था| मैं घोड़ी से उतर गया अपना सेहरा उतारा और माँ, पापा के साथ उसकी तरफ गया| वो हमे अपनी और आते देख और भी हैरान हो रही थी|

“नमस्ते बहन जी”, पापा ने श्रुति की माँ को कहा|

“जी नमस्ते, लेकिन आपको पहचाना नहीं”, श्रुति की माँ ने कहा|

“जी आप अंदर चलिए, हम अंदर चल के बात करते हैं”, माँ ने कहा|

उनके पुरे मोहल्ले में कानाफूसी शुरू हो गयी थी| हम अंदर पहुचें| हमारे माता पिता आगे आगे और मैं और श्रुति पीछे पीछे|

“ये सब क्या है?”, श्रुति ने मेरी बाजू खीच कर कानों में फुसफुसा कर पूछा|

“बस देखती जा”, मैंने मुस्कुरा के जवाब दिया|

हम लोग भी अंदर कमरे में पहुचें जहाँ सभी बड़े लोग बैठे थे|

“आपके बेटे ने जिद्द की और आपने मान भी ली| वो तो अभी बच्चा है लेकिन आप तो बड़े हैं| आपको भी तो समझना चाहिए”, उसकी माँ ने कहा|

“बहन जी संकेत हमारा इकलौता बेटा है| हमने कभी इसका दिल नहीं दुखाया| इसकी हर जिद्द मानी है| हमने इसे समझाने की कोशिश भी की पर इसकी जिद्द के आगे हार गए| लेकिन उसने हमसे आजतक कभी कुछ नहीं छुपाया| वो श्रुति को पसंद करता है| उसने आजतक हमारी हर ख़ुशी का ख्याल रखा है और मैं आपको यकींन दिलाता हूँ की ये श्रुति को भी बिलकुल खुश रखेगा| श्रुति और संकेत एक दुसरे के अच्छे दोस्त भी थे| आपको श्रुति की शादी आपको आज नहीं तो कल करनी ही है”, माँ ने समझाते हुए कहा|

“देखिये बहन जी....”, श्रुति की माँ ने कहा|

“सुष्मा”, अचानक बाहर से आवाज आई|

सबने बाहर की तरफ देखा| रिंकी और उसकी माँ बाहर खड़े थे| आवाज रिंकी की माँ ने श्रुति की माँ को लगाई थी| श्रुति और उसकी माँ रिंकी की माँ से बात करने बाहर चले गए|

“माँ, वो मान तो जायेंगे ना”, मैंने पूछा|

“बेटा तू चिंता मत कर| जो होता है अच्छे के लिए होता है”, माँ ने सर पे प्यार से हाथ फेरते हुए कहा|

थोड़ी देर के इंतेजार के बाद सब अंदर आये|

“जी हमे ये रिश्ता मंजूर है”, श्रुति की माँ ने कहा|

हमारी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा| हमने एक धर्मशाला में सारा प्रबंध कर रखा था| उन्हें धर्मशाला के बारे में बता दिया था| सब धर्मशाला पहुँच गए| फेरों का वक़्त था, सब रस्में पूरी करके हम बड़ों का आशीर्वाद ले रहे थे| माँ पापा का आशीर्वाद लेने के बाद जब श्रुति की माँ की तरफ गए|

“श्रुति, तू यहाँ!!!!”, मैं श्रुति को उसकी माँ के साथ खड़ा पाकर हैरान रह गया|

मैंने दुल्हन का घूँघट हटाया|

“रिंकी, तू, ये सब क्या है?”, मैंने गुस्से से पूछा|

“बेटा श्रुति की सगाई पहले ही हो चुकी है और यही मैं बता रही थी की रिंकी की माँ आ गयी”, श्रुति की माँ ने कहा|

“जी हाँ, फिर रिंकी ने हमे बताया की वो तुझ निखट्टू को पसंद करती है| अब रिंकी की किस्मत ही खराब हो तो फिर हम क्या कर सकते थे”, श्रुति रिंकी के गले बाहें डालकर बोली|

“अब अगर तुम बिना बताये बारात ला सकते हो तो हम भी बिना बताये दुल्हन देंगे ना”, रिंकी बोली|

“तेरा भी कॉलेज में रिंकी बिना कहाँ मन लगता था| बस तुम दोनों के दिल की सोचकर रिंकी को बलि चढ़ा रहे हैं”, श्रुति ने कहा|

“तुम लड़कियों ने तो हद्द ही कर दी| चलो मैं तो डायन से शादी करने निकला था चुड़ैल से हो गयी, मेरी तो एक ही बात है”, मैंने कहा|

“लेकिन तूने बताया क्यों नहीं की तेरी सगाई हो चुकी है”, मैने पूछा|

“अगर मुझे पता होता तू ऐसी छिछोरपंती करेगा तो जरुर बताती”, श्रुति हँसते हुए बोली|


सब ठहाका मारकर हँसने लगे| मेरी और रिंकी की शादी बड़ी धूमधाम से हुई| मैं उसको चुड़ैल कहके बुलाता हूँ और वो मुझे छिछोरा|

1 comment:

आपकी टिप्पणी के लिए धन्यवाद!!!!