Thursday, February 20, 2014

सरकारी नौकरी

"सुशील कुमार, इलेक्ट्रिकल इंजिनीयर, फर्स्ट डिवीज़न", मैं उसके कागज पढ़ रहा था| पढ़ते पढ़ते मैं अपने ख्यालों में खो गया|

मैं आयुष, एक माध्यम वर्गीय परिवार से सम्बन्ध रखता था| हम जैसे लोगों के बहुत से सपनें होते है| हम सब चाहते है की हम अपने सपनों को पूरा करे, लेकिन घर चलाने में ही ऐसी कमर टूट जाती की सपने पूरा करने से पहले साँसे पूरी हो जाती है| मेरा भी एक सपना था, भ्रष्टाचार मुक्त भारत, भाई मेरा तो दम निकलना स्वाभाविक था| हम एक मोहल्ले में छोटे से घर में रहते थे| हमारा आस पड़ोस भी सब अच्छा था| हमारे पड़ोस में ही एक अंकल जी रहते थे| वो पेशे से सरकारी अध्यापक थे| मैं उन्हें चाचाजी कहकर बुलाता था| बड़े ही हँसमुख, ईमानदार और नेकदिल इंसान थे| मैं अपना वक़्त अक्सर उन्हीं के साथ बिताना पसंद करता था|

उनका कहना ये होता था, “ईमानदारी की राह चाहे कितनी भी कठिन हो लेकिन हमेशा उसी रस्ते पर चलना चाहिए| कभी भी सच बोलने से घबराना मत| ऐसे बनो की तुम्हे देखकर बेईमानों को भी अपने आप पर शर्मिंदगी हो|

मैंने उनसे प्रभावित होकर सच्चाई का साथ पकड़ लिया था| मैं जितना हो सके झूठ बोलने से बचता था| झूठ बेईमानी की पहली सीढ़ी है| मेरा ये मानना था कि अगर हमारे दिल में ईमानदारी नहीं होगी तो हमें रिश्तों की भी अहमियत नहीं होगी|

मैं अपनी पढाई पूरी कर चुका था और सरकारी नौकरी की तलाश में था| अपनी नौकरी ईमानदारी से करके सरकारी लोगों की जो भ्रष्टाचार वाली छवि को सुधारना चाहता था| बहुत कोशिशों के बाद एक इंटरव्यू देने का मौका मिला| दफ्तर पंहुचा तो देखा 30-35 लोग वहां आये हुए थे|

“आयुष, तुझे इन सबसे आगे निकलना है”, मैं मन ही मन सोच रहा था|

“आपको अंदर बुलाया गया है”, चपरासी ने मेरा नंबर आने पर कहा|

“मे आई कम इन सर”, मैंने दरवाजे से ही पूछा|

“यस प्लीज, आइये, बैठिये”, उन्होंने कहा|

मैं बैठ गया और वो मेरी फाइल देखने लगे|

“आयुष कुमार, इलेक्ट्रिकल इंजिनीयर, फर्स्ट डिवीज़न”, उन्होंने कहा|

“यस सर, मैं अपनी क्लास में हमेशा से टॉप करता रहा हूँ सर”, मैंने बड़े ही गर्व से उन्हें बताया|

उन्होंने मुझसे कुछ सवाल किये जो अक्सर हर इंटरव्यू में होते ही है| उनकी तरफ देख कर लग रहा था जैसे वो मुझसे प्रभावित हुए|

कुछ देर तक फाइल देखने के बाद अपने चेहरे में तीखी सी मुस्कान ला कर बोले, “तुम्हारे सफ़ेद कागज तो सब सही है पर हरे कागज कितने लाये हो|

“हरे कागज, सर, मैं कुछ समझा नहीं”, मैंने अचंभित होकर पूछा|

“अरे भाई, तुम सरकारी नौकरी का फायदा तो उठाओगे ही ना, तो उसका हमें भी तो कुछ फायदा होना चाहिए”, उन्होंने उसी लहजे में कहा|

“सर, मैं अपना काम ईमानदारी से करना चाहता हूँ| मैं अपनी मेहनत को यहाँ बेचने नहीं आया हूँ| आखिर मैं आपको रिश्वत क्यूँ दू, आपको मेरी काबिलियत परख कर जॉब देनी होगी”, मैं थोडा तेज आवाज में बोला|

“रिश्वत कहाँ जनाब, ये तो फीस है हमारी, वैसे भी तुम्हारे जैसे यहाँ पचासों काबिल है, हम किस किस को नौकरी बांटते फिरे”, उसने थोडा रौब डालते हुए कहा|

“जो सबसे ज्यादा काबिल होगा उसी को दीजियेगा| सरकार की नौकरी है कोई तुम्हारे बाप की नहीं जो तुम हराम के पैसे मांग रहे हो”, मैंने गुस्से में मेज पर हाथ पटक कर कहा|

“देखो जुबान संभाल कर बात करो, तुम सरकारी कर्मचारी से ऐसे बदतमीजी से बात नहीं कर सकते, और जहाँ तक रही रिश्वत की बात उसके बिना तो सरकारी नौकरी के ख्वाब देखना बंद ही कर दो तो अच्छा है”, उसने गुस्से में कहा|

“साले, हरामखोर”, मैंने उसके गाल पर एक जोरदार तमाचा जड़ दिया|

“चौकीदार, चौकीदार, इसे यहाँ से बाहर निकालो”, वो चिल्लाया|

चौकीदार मुझे गर्दन से पकड़ कर बाहर की ओर खीचतें हुए ले गया| मैंने अपने आप को छुडवाने की कोशिश की मगर उसकी पकड़ बहुत तेज थी| उसने मुझे दरवाजे पर ले जाकर बाहर की तरफ धक्का मार दिया| मैं उन्हें गलियां बकता हुआ घर चला गया| मैंने सोच लिया था कि कल सुबह होते ही उनके खिलाफ घूसखोरी का मुकद्दमा दर्ज करवाऊंगा| अगले दिन सुबह सुबह ही दरवाजे पे दस्तक हुई| मैं चौबारे पे सोया हुआ था| माँ ने जाकर दरवाजा खोला|

“आपका बेटा कहाँ हैं”, एक कड़कदार आवाज सुनाई पड़ी| मैं छुपकर देखने लगा|

“क्यूँ सर, क्या हुआ सर, उसने क्या किया सर”, माँ ने घबराते हुए उससे पूछा|

“उस पर सरकारी कर्मचारी से बदतमीजी और मार पीट का केस दर्ज है| मैं उसे थाने ले जाने आया हूँ”, उसने अंदर की तरफ घुसते हुए कहा|

वो मुझे ढूंढने ही आ रहा था| मैं छत के पीछे वाले खाली प्लाट से कूद कर चाचाजी के घर चला गया|

“चाचा जी, मेरे पीछे पुलिस पड़ी है, मुझे जेल नहीं जाना चाचाजी, वो लोग मुझे मारेंगे”, मैंने हडबडाहट में डरते हुए बोला|

“तुम अंदर छुप जाओं बेटा, पुलिस आयेगी तो मैं देख लूँगा”, चाचाजी ने कहा|

कुछ देर बाद उन्होंने बाहर बुलाया. “वो यहाँ नहीं आये, मैं बाहर देख आया वो चले गए| पर वो लोग तुम्हारे पीछे क्यूँ पड़े थे बेटा, आखिर तुमने किया क्या है”, चाचा जी ने पूछा|

“ह्म्म्म, ये बात है| तुम्हे उससे हाथापाही करने की क्या जरूरत थी, तुम्हे चुपचाप वहां से आ जाना चाहिए था| अब तो तुम उस पर घूसखोरी का केस भी नहीं कर सकते”, चाचा जी ने चिंता जताते हुए कहा|

“अब मुझे क्या करना चाहिए चाचा जी”, मैंने पूछा|

“तुम्हे वहां के मैनेजर से बात करनी चाहिए| पहले तुम नहा धो के नाश्ता कर लो, मैं तुम्हारे साथ चलता हूँ”, चाचा जी ने कहा|

“शुक्रिया चाचाजी, पर मैं अकेला चला जाऊंगा, आप चिंता न करें”, मैं ये कहकर घर चला गया|

थोड़ी देर बाद ही मैं उस दफ्तर के बाहर खड़ा था| किसी तरह नजर बचाकर मैं मैनेजर के कमरे तक पंहुचा|

“सर, मुझे आपसे कुछ बात करनी है”, मैं बोला|

“तुम, तुम ने ही कल...”, उसने चौंकते हुए कहा|

“जी सर, पर आप मेरी बात तो सुनिए”, मैं उसकी बात काटकर बीच में ही बोल पड़ा|

“बताओ, क्या कहना है”, वो बोला|

“सर, वो रिश्वत मांग रहा था और मेरा गुस्से में हाथ उठ गया| सर मैं अपनी नौकरी बहुत ही ईमानदारी से करना चाहता हूँ| मैं इस नौकरी के लिए अपने आप को काबिल मानता हूँ और इसके बावजूद मुझे रिश्वत देनी पड़े तो मुझे देश के भ्रष्ट लोगों पे शर्मिंदगी होती है| मैंने अपनी पढाई के लिए दिन रात एक कर दिए, अब भी अगर मुझे बिना रिश्वत के नौकरी नही दी जाती तो मैं उस कर्मचारी के खिलाफ केस दर्ज करा दूंगा|”, मैंने थोडा सख्त अंदाज से बोला|

“तो ये मामला है| पर तुम्हे उस से बदतमीजी करने से पहले मेरे पहले पास आना चाहिए था, मैं उसे उसी समय बर्खास्त कर देता| खैर छोड़ो, एक काम करो तुम अभी अपने आप को पुलिस के हवाले कर दो, मैं तुम पर लगा हुआ केस हटवा दूंगा”, उन्होंने बड़े ही प्यार से कहा|

मैंने उसकी बात मान ली और पुलिस थाने चला गया| शाम को माँ और चाचाजी वहां पहुचें|

“सर, मेरा बेटा अभी बच्चा है, उसे छोड़ दीजिये”, माँ की आवाज सुनाई दी| मैं दीवार में कमर टिका के बैठा हुआ था|

“माँ, चाचाजी, इधर आओ”, मैंने उठकर पुकारा|

“बेटा तुम यहाँ क्यों आ गए, हम कुछ हल निकाल लेते”, चाचाजी ने कहा|

“वहां के मैनेजर से बात करके आया था, उसी ने मुझे भरोसा दिलाया है कि उस कर्मचारी के खिलाफ एक्शन लेंगे”, मैंने उन्हें समझाया|

“तुम भी कहाँ उनकी बातों में आ गए बेटा, ये सब एक ही थाली के चट्टे बट्टे है”, चाचाजी ने कहा|

“क्यों चाचाजी, ऐसा क्या हुआ?”, मैंने हैरान होकर पूछा|

“तुम पर कर्मचारी से मार पीट के अलावा वहां के मैनेजर को रिश्वत देने का आरोप लगा है”, चाचा जी ने कहा|

“क्या?”, मैं हक्का बक्का रह गया|

“हाँ, पर तुम फ़िक्र मत करो, मैंने कुछ इन्तेजाम किया है और तुम चुप चाप मेरी बात मानोगे”, चाचाजी ने कहा|

“क्या किया है, कहीं आपने तो उन्हें”, मैंने संदेह जताया|

“बेटा, करना पड़ता है, मजबूरी है, हम जैसे लोगों के पास आखिर एक यही एक उपाय बचता है| इन्हें बस पैसा चाहिए होता है, इनका लिए पैसा ही धर्म होता है| अब वो कर्मचारी और मैनेजर अपना केस वापस ले लेंगे और तुम भी उनसे माफ़ी मांग लेना”, चाचाजी ने कहा|

“चाचा जी, आप भी, आप ही ने मुझे सच्चाई का रास्ता दिखाया था और आज आप खुद ही बेईमानी का हाथ पकड़ रहे हो”, मैंने कहा|

“आयुष बेटा ये जिन्दगी के सवाल बड़े ही टेढ़े है, क्या पता कब कहाँ कौन सा रंग दिखा दे| अब तुम्हे मेरी एक और बात माननी होगी”, चाचाजी ने कहा|

मैंने उसे कर्मचारी और मैनेजर से ना चाहते हुए भी माफ़ी मांगी| चाचा जी उन्हें मेरी जॉब के लिए भी रिश्वत दी थी| मैं भी अपना मन मारकर चाचाजी की बात मान गया और ना चाहते हुए भी नौकरी स्वीकार कर ली|

मैं अपने ख्यालों से बाहर आया| इंटरव्यू जारी रखा, “हाँ तो मिस्टर सुशील, तुम्हारे सफ़ेद कागज तो सब सही है पर हरे कागज कितने लाये हो|

“मेरी ज्वाइनिंग डेट जरा जल्दी रखना सर”, वो मुस्कुराया और एक गड्डी थमाकर चला गया|


मैं तो उन्हें अपने रंग में नहीं रंग सका, पर उन्होंने मुझे अपने रंग में रंग दिया| पंद्रह साल हो गए नौकरी करते करते पर हर एक ने हरे कागज की बात मुस्कुरा के ही जवाब दिया| आज तक मुझे दूसरा आयुष नहीं मिला|

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