Friday, February 14, 2014

शौना

शौना, शौना नाम था उसका| मैं कब उससे प्यार करने लग गया था मुझे खुद ही नहीं पता चला| बड़ी ही प्यारी लड़की थी| आखों पे चश्मा लगा हुआ था| मैंने उसे हमेशा कॉलेज की ड्रेस में ही देखा था| उसकी सादगी मुझे उसकी तरफ और भी ज्यादा आकर्षित करती थी| उससे हुई आखरी मुलाकात आज भी याद है|

शौना और मैं, हम साथ पढ़ते थे| हम दोनों ने शहर के एक कॉलेज में दाखिला लिया था| अलग अलग गाँव में रहते थे| एक ही क्लास में पढ़ते हुए भी एक दुसरे से कभी कोई बात नहीं होती थी| क्लास के दौरान मेरा सारा ध्यान उसी की तरफ होता था| क्लास में उसे हर पल निहारना आदत सी हो गयी थी| उसका उसकी सहेलियों के बीच खिलखिला कर हँसने का तो मैं कायल ही हो गया था| कॉलेज में सबसे पहले आकर उसकी इन्तेंजार करना, उसके आते ही उसके पीछे पीछे क्लास रूम तक जाना और जिस दिन वो ना आये तो बिना क्लास जाए ही घर वापिस चले जाना, ये सब भी मेरी आदत में शामिल थे| कॉलेज के अढ़ाई साल तो उसके दीदार में कब गुजर गए पता ही ना चला|

सेमेस्टर सिस्टम लागू था, और पांचवे सेमेस्टर की परीक्षा चल रही थी| परीक्षा का समय सुबह का था| हमें जल्दी ही आ जाना पड़ता था| परीक्षा के दिन का बेसब्री से इन्तेंजार रहता था| परीक्षा के दिन तो मैं सुबह सूरज निकलने से पहले अपने आप ही उठ जाता था| पहली बस पकड़ के कॉलेज पहुँचता तो वो क्लास रूम के बाहर सीढ़ियों पे बैठकर पढ़ रही होती थी| मैं भी उसके सामने वाली कोई जगह ढूंढ कर पढ़ने का दिखावा करता और छुप छुप के उसे देखता रहता| उसका शायद मेरी तरफ कभी ध्यान ही नहीं गया, लेकिन मैं आदत बरकरार किये हुए था|

मेरे कुछ दोस्त थे जो मेरे प्यार के बारे में जानते थे| मैं यूँ ही गप्पे हाकने के लिए कह देता था, “भाइयों, इस बार तो ये तुम्हारी भाभी बन कर रहेगी|” मेरे दोस्त मेरे मजे लेते, “हाँ हाँ, भाभी ना बना पाया तो उसका कन्यादान कर अइयो|” दोस्त भी पड़े कमीने होते है, पर मेरे दोस्त मेरे लिए परिवार की तरह थे| हम सभी दोस्त कॉलेज में साथ ही रहते थे, और शाम को साथ भी जाते थे| कॉलेज से छुट्टी होती थी तो हम सब दोस्त एक साथ निकल जाते थे| जब कभी शौना रस्ते में जाते हुए दिख जाती थी तो मेरे यार कहते, “वो देख तेरी हिरोइन जा रही है|” और मैं मेरे दोस्तों के साथ हंसी मजाक करता शौना के पीछे पीछे रहता था, लेकिन उसे कभी एहसास नहीं होने दिया की उसके लिए पीछे आ रहा हूँ|

पांचवे सेमेस्टर की आखरी परीक्षा थी| मैं शौना को आज अपने दिल की बात का इजहार करने वाला था| उस दिन तो मैं सिर्फ समय गुजारने के लिए ही परीक्षा में बैठा था| उसकी परीक्षा दुसरे कमरे में थी इसलिए परीक्षा में मन भी नहीं लग रहा था| अपनी परीक्षा आधे समय में ही ख़तम कर मैं बाहर उसके निकलने का इंतज़ार करने लगा| उस दिन का समय बड़ी मुश्किल से गुजरा| परीक्षा देके वो अपनी सहेलियों के साथ बाहर निकली और पार्क में जाके बैठ गयी| कुछ समय मैं उसे देखता रहा, उसके पास जाके बोलने की हिम्मत ही नहीं बनी| किसी तरह हिम्मत जुटा के मैं उसकी तरफ गया|

“शौना”, मैंने कंपकपाती हुई आवाज में उसे पुकारा| पर उस तक आवाज ही नहीं पहुंची|

“शौना”, मैंने थोडा जोर से पुकारा| मैं उससे 2 ही फीट की दुरी पे था, फिर भी उसे मेरी आवाज नहीं सुनाई दी| पहली बार जो उससे बात करने जा रहा था, उस पर से आशिकी का मामला, आवाज तो दबनी ही थी| आखिर उसकी सहेली की नजर मुझ पे पड़ी, उसने शौना को इशारा कर दिया|

“हाँ जी, कहिये”, शौना ने कहा|

पहली बार उसने मुझसे कुछ कहा, मेरी ख़ुशी का ठिकाना ही नहीं था| मैं बड़ी मुश्किल में था, उसे कहने को तो बहुत कुछ याद किया था लेकिन उसके सामने आते ही सिट्टी पिट्टी गुम हो गयी|

“अरे, बोलो क्यों बुलाया”, शौना ने फिर कहा|

“मैं, वो, मैं, मुझे कुछ, कुछ कहना”, मैंने डरते हुए सिर्फ इतना ही बोला| मेरी तो डर के मारे हालत ख़राब हो रही थी| मना करने से ज्यादा तो इस बात कर डर था कहीं थप्पड़ ना मार दे|

“हाँ, बोलो”, शौना ने कहा|

“मैं तुमसे दोस्ती करना चाहता हूँ”, मैंने आखिर कह ही दिया| इतनी सी बात बोलने को मैंने बड़ा इंतज़ार किया था|

“तुम हो कौन, मैं तुम्हे जानती तक नहीं, दोस्ती तो बहुत दूर की बात है|”, वो मुझे डांट कर चली गयी|

उसने शायद मेरी बातों से अंदाजा लगा लिया था की मैं क्या कहना चाहता था| हम अढाई साल एक साथ पढ़े लेकिन उसने मुझ पर इतना ध्यान नहीं दिया की मैं उसकी क्लास में पढता था| मेरा नाम तो दूर, मुझे क्लास में कभी देखा तक नहीं| मेरे दोस्त दूर से ही ये नजारा देख रहे थे| मैं अपना सा मुह बनाकर उनके पास गया|

“क्यों बेटा, करा ली झंड|”, मेरे दोस्तों ने चिढाते हुए कहा|

“यार, वो मुझे जानती तक नहीं, हद्द हो गयी|”, मैंने कहा|

“बेटा, ये लड़की वडकी के चक्कर में ऐसा ही होता है, छोड़ सब अब आखरी सेमेस्टर में थोडा पढाई पे भी ध्यान लगा लियो| अब जॉब लगनी शुरू हो जाएगी|”, यारों ने कहा|

“हाँ यार, मेरा वैसे भी कुछ ना होने वाला, शुक्र है कम से कम थप्पड़ नहीं मारा| चलो चलते है, वैसे आज मेरा दिल टुटा है तो पार्टी तुम लोग दोगे, मैं सिर्फ खाऊंगा|”, मैंने बोला|

“ये कंजूस को कौन लड़की हाँ भरेगी, चलो चलो|”, सब यार दोस्त हँसते हुए घर चले गए|

उस दिन घर जाकर रात भर रोता रहा| “लेकिन उसे मेरे आंसुओं की क्या फ़िक्र होगी| लेकिन उसमे गलती उसकी भी तो नहीं थी, मैं भी तो एकदम चला गया| उसे पुरे कॉलेज के सामने ऐसा बोल दिया| भला, ऐसे कोई अपने प्यार का इजहार करता है|”, मैं रात भर ये सब सोचता रहा| मैंने तो उसके संग जीने के सपने तक देख लिए थे| वो हर रोज सुबह मुझे प्यार से उठाएगी, मुझे चाय पिलाएगी| मैं उसका रसोई में हाथ बटाउंगा, उसके साथ छेड़खानी करूँगा| लेकिन सब सपनों में ही रह गया| पर ये उससे आखरी मुलाकात नहीं थी| अभी तो एक सेमेस्टर बाकी था और मैं भी पूरा ढीठ था| मैंने भी सोच लिया था के कॉलेज शुरू होते ही फिर से कोशिश करूँगा|

आखिर सेमेस्टर शुरू हो गया और मैं भी लगा पहले दिन अपनी हिरोइन को ढूंढने| पार्क में बैठ कर उसका इंतज़ार किया, वो अपनी सहेलियों के साथ आई| मैं उसे देखता रहा, उसकी सहेलियों में खुस पुस होने लगी| उन्होंने मुझे देख लिया था और उसने भी| लेकिन मुझ पर से ध्यान हटाकर वो क्लास की तरफ चल पड़ी और मैं उसके पीछे पीछे|

“अब वो मुझ पर कम से कम ध्यान तो देगी ही और फिर पसंद भी करने लगेगी”, मैंने अपने दोस्तों से इतराते हुए कहा|

“हाँ यार, अपनी शादी में तो बुलाएगा ना”, कहकर मेरे दोस्त खिलखिलाने लगे|

मैं क्लास में उसके ठीक दाहिनी और की सीट पे बैठ गया, ताकि उसे अच्छी तरह से देख सकूँ| वो मुझे बीच बीच में देखती, नाक सिकोड़ती और फिर पढाई पे ध्यान देने लगती| क्लास ख़तम होते ही मैं उसकी बाहर इंतेजार करने लगा|

“प्लीज, उस दिन के लिए मुझे माफ़ कर दो|”, मैंने कान पकड़ते हुए एक बच्चे की तरह उससे माफ़ी मांगी|

“अरे, अरे, नहीं सौम्य, मैं नाराज वराज नहीं हूँ और माफ़ी मांगने की कोई जरूरत नहीं है|”, शौना ने बड़े प्यार से कहा और चली गयी| लेकिन मीठी आवाज के पीछे की नाराजगी तो मैं समझता ही था| खैर, उसे मेरा नाम तो पता चला| मैं तो इसमें ही बड़ा खुश हुआ और लगा डींग हाकने अपने दोस्तों के सामने|

फिर कॉलेज के टाइम मेरी शौना से कभी बात नहीं हुई| हाँ मैंने जरुर एक दो बार काम के बहाने से बात करने की कोशिश की थी| उसके साथ वाली सीट पे बैठना, उसे देखते रहना ये सब कॉलेज टाइम में चलता ही रहा| कॉलेज की परीक्षा का आखरी दिन था| मैं हर बार की तरह सुबह ही आ गया, और वो सीढ़ियों पे बैठ कर पढ़ रही थी| उसने मुझ पर ध्यान देते हुए भी मेरी तरफ देखा नहीं| परीक्षा ख़तम होते ही सब बाहर निकले| मैं बाहर पार्क में बैठा उसके निकलने का इंतज़ार कर रहा था| वो अपनी सहेलियों के साथ पार्क में बैठ गयी, और मैं आदतन उसे निहारता रहा| कुछ देर बाद वो जाने लगी| मेरा मन किया कि मैं उसे आज फिर उसे दिल का हाल बताऊं, लेकिन हिम्मत ही नहीं पड़ी| वो चली गयी और मैं कॉलेज के गेट की तरफ देखता रहा|

“गयी बेटा वो, चल अब अपन भी चलते है|”, मेरे यार जाने के लिए तैयार थे|

“यार क्या मैं आज के बाद उसे कभी नहीं देख पाउँगा”, मैंने उदास होकर पूछा|

“अरे यार, चिंता क्यों करता है, किस्मत में होगी तो जरुर मिलेगी| चल आज की पार्टी तू दे कमीने, आज तेरा दिल दुबारा टूटने से बच गया|”, हम सब दोस्त एक दुसरे के गले मिले|

कुछ दिन तक उसके बारे में सोच सोच कर परेशान रहा, लेकिन फिर नौकरी की झंझट में सब कुछ सिमट कर रह गया| परिवार से दूर रहना पड़ता था तो माँ की याद ही सताती रहती थी| लेकिन मेरी नौकरी ज्यादा दूर नहीं थी, मैं हर हफ्ते घर का चक्कर लगा के आता था|

मैं वहां हॉस्टल में रहता था, एक हफ्ते घर जा नहीं पाया| मैं घुमने फिरने का बड़ा शौक़ीन था, तो उस दिन शहर के नज़ारे देखने निकल लिया| मार्किट में घूमते घूमते अचानक कोई नजर आया और भीड़ में गुम हो गया| मैं उसी तरफ दौड़ा दौड़ा गया|

“शौना”, मैंने पीछे से आवाज लगाई|

“अरे, सौम्य, तुम यहाँ कैसे?", शौना ने प्यार से पूछा|

“मैं तो यहीं जॉब करता हूँ, तुम यहाँ कैसे?”, मैंने पूछा| मेरी ख़ुशी का तो ठिकाना ही नहीं था| मुझे अंदाजा तक नहीं था की मैं उससे कभी मिल भी पाउँगा| मैं उसे कैफ़े में ले गया ताकि अच्छे से बात भी हो सके और कुछ खाया पिया जा सके|

हमने उस दिन ढेर सारी बातें की, कॉलेज की, अपनी जिन्दगी की और मेरी उस पहली मुलाकात वाली बात को लेकर मेरा बड़ा मजाक भी बनाया| पर मैं बहुत खुश था की उसने मुझसे इतने प्यार से और इतनी देर तक बात की| हमने सारा दिन साथ में बिताया| शाम को उसे जाना था तो मैं उसे छोड़ने उसके साथ गया| “वो शायद मझे पसंद करने लगी थी तभी तो वो एक दिन में ही इतना घुल मिल गयी| लेकिन ऐसा भी तो हो सकता है की सिर्फ दोस्त के नाते ही उसे मेरा साथ पसंद आया हो|”, ये विचार मेरे दिमाग में घूमते जा रहे थे|

मैं उसे बस अड्डे तक छोड़ आया| मैं सोचता रहा उसे बोलूं या ना बोलूं| वो बस में बैठ गयी और मैं बस की तरफ देखता रहा| बस जैसे ही चलने लगी मैं पीछे पीछे दौड़ा| उसने खिड़की से मेरी तरफ देखा और मुस्कुराने लगी| उसने मेरी तरफ हाथ हिलाकर अलविदा का इशारा किया| मैंने भी उसके जवाब में हाथ हिलाया| शौना जा चुकी थी, वो मेरे सपने भी ले गयी| यही हमारी आखरी मुलाकात थी| अपनी पसंद को मारकर मैंने जीना सीख लिया था| लेकिन मैं आज भी उसको याद करता हूँ|

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