Thursday, September 19, 2013

महंगाई

अजी क्या कहें महंगाई का, बस कमर दुखायी जाती है,
किस्तों के पेट्रोल से गाड़ी चलाई जाती है।

कम चीनी की चाय थोड़े दूध मे बनाते है,
बिना प्याज टमाटर के आज सब्जी पकाई जाती है।

अपनी जरूरतें उधारी की गुलाम हो गयी है,
भैंस के आगे जैसे बीन बजाई जाती है।

सिफ़ारिश और रिश्वतखोरी का बोलबाला है,
पाँव देखकर चादर आजकल नहीं फैलाई जाती है।

रिश्ते भी आज महंगाई का शिकार हो गए है,
अपने ही घर में बातों की आग लगाई जाती है। 

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