Tuesday, September 10, 2013

माँ ओ माँ


"माँ ओ माँ", मेरा दूसरा लेख। हास्य और करुणा को एक साथ पिरोने की कोशिश की है। आशा करता हूँ आपको पसंद आएगा। 

माँ ओ माँ, मेरी टाई कहाँ है?, -- कमरे में से ही चिल्लाते हुए मैंने पूछा।
“आँख लगा दिख जाएगी, वहीं खूंटी पे टंगी है अंधे।”, -- माँ ने रसोई में से ही उत्तर दिया।
और मेरे जूते?”, -- मैंने फिर पूछा?
मेरे सिर पे। कितनी बार कहा है अपनी चीजें संभाल के रखा कर।”, -- माँ ने थोड़ा नकली गुस्सा दिखाते हुए कहा।

मैं हर रोज शाम को स्कूल से जब घर आता हूँ, तो खेलने की जल्दी अपना सब समान इधर उधर फेंक देता हूँ।  और हर सुबह ऐसे ही माँ को परेशान करता हूँ।

अरे माँ, अगर मैं सब चीजों को ढूंढुंगा तो सुबह सुबह तुम्हें परेशान कौन करेगा? , -- मैंने मज़ाक में कहा।
चल रे, बातों मे लगाना कोई तुझसे सीखे। चल जा अब स्कूल वरना रोज की तरह मास्टर जी के डंडे पड़ेंगे।, -- माँ ने हँसते हुए कहा।

ये हंसी मज़ाक हम माँ बेटे के बीच मे हर रोज चलता ही रहता है। शाम हुई और मैं घर लौटा, लग गया हर रोज की तरह खेलने। अजी नोक झोंक तो हमारी हर समय चलती रहती है तो फिर अब क्यों ना होती। हमारे घर का आँगन काफी बड़ा है, और शाम को हम सब अड़ोस पड़ोस के बच्चे इकट्ठे होके खेलते हैं। तो उस दिन भी खेल रहे थे।

सुमित, अंदर आके चाय पी ले बेटा।”, -- माँ ने अंदर से आवाज लगाई।
यहीं ले आओ ना माँ। – मैंने बाहर से ही कहा।

मैं खेलते हुए सब भूल जाता था। खेल के आधे में ही छोड़ना मुझे पसंद ना था।

तू आ रहा है या मैं आऊँ?”, -- माँ ने थोड़ा डाँटते हुए कहा।
“आप ही आ जाओ माँ और मेरी चाय भी लेते आना।”, -- मैंने भी अपने अंदाज मे बोल दिया।  

बस फिर क्या था, एक जोरदार ठहाका। सभी दोस्त और माँ खिलखिलाने लगे। अजी गुस्सा तो दो पल का ही होता था, ऐसे ही मजे से ज़िंदगी चलती है हमारी। लेकिन कभी कभी घर मे उदासी भी छा जाती थी। अजी हम बच्चे हैं, कभी भी कोई चीज किसी पड़ोसी के घर देख लेते थे तो, हमारे मन में भी वो लेने की ख़्वाहिश होती थी।

“माँ, ओ माँ।”, -- मैं धीमे से बोला।
हाँ बोल बेटा।”, माँ ने पूछा। मेरी शक्ल देख के माँ समझ तो गयी थी की मुझे कुछ चाहिए था। अक्सर अपनी फरियाद लेके ऐसे ही माँ के पास जाता था।
“माँ, वो, वो, मेरे दोस्त के पास एक विडियो गेम है। हम भी ले ले?, मैंने डरते हुए पूछा।
अरे बेटा, क्या करेगा उसका, फालतू की चीजें है। वो तेरा दोस्त तो है ही बड़ा खराब। तू पैसे लेके कुछ चीज खा आ। ये ले एक रुपैया और कुछ ले के खा लियो।”, -- माँ ने समझाते हुए कहा।
नहीं माँ, मुझे तो बस विडियो गेम चाहिए, और कुछ नहीं।”, -- मैंने जिद्द करते हुए कहा।

माँ ने बहुत समझाया और आखिर मे धमका दिया। मैं रोने लगा। उस रात मैं बिना खाना खाये रोते हुए सो गया। मेरी माँ ने भी कुछ नहीं खाया होगा।

मैंने उस रोज खाना नही खाया, जिस दिन अपने लाल को धमकाया था।
कैसे पूरी करती जिद्द मैं उसकी, घर में आटा बड़ी मुश्किल से आया था।  

माँ को पता है की मेरी नाराजगी बस कुछ ही समय की होती है। सुबह मैं उठा तब गेम की बात भूल चुका था।

“इतनी रात कहाँ था रे?, -- माँ ने मेरे देर से आने पर पूछा।
“दोस्तों के साथ खेलते हुए देर हो गयी थी माँ। बड़े मजे किए आज तो, एक नया खेल खेला।”, -- मैंने खिलखिलाते हुए कहा।
इतनी देर तक अकेला मत खेला कर।”, -- माँ ने कहा।
“अकेला थोड़ी था मैं, माँ। अच्छा तुम ही तो कहती हो की, चाँद हमारा मामा है। वो भी तो रात को ही घर से निकलता है।”, -- मैंने मज़ाक में बोला।
माँ भी आखिर मेरी माँ थी। तपाक से बोली, -- “अभी तू मामा के घर नहीं दादा जी के घर है, इसलिए सूरज चाचा के साथ निकला कर।”, और फिर एक जोरदार ठहाका।

“सुमित, ओ भाई कहाँ खो गया।”, संदीप ने कहा।
“हम्म, हाँ।”, -- मैंने चौंकते हुए संदीप की तरफ देखा।

संदीप मेरा बहुत अच्छा दोस्त है। उसके पास ही बैठा था मैं, और अचानक बचपन कि यादों में खो गया था।

“कुछ नहीं भाई, बस बचपन की यादों में चला गया था। जब मैं छोटा था, घर एकदम खिला खिला सा रहता था। जब से कमाने लगे है, दिनचर्या ही कुछ ऐसी हो गयी है, कि अपने ही घर में रहते हुए भी बेगाने है। काम के दबाव मे इतने चिड़चिड़े हो गए है, कि कोई बात अच्छी ही नहीं लगती। खुशियाँ तो जैसे घर से गायब ही हो गयी है।”, -- मैंने उदास भरे लहजे में दोस्त से कहा।

“हाँ यार, बात तो तेरी सही है।”, -- संदीप ने भी हाँ मे हाँ मिलाई।

“भाई आजकल तो ये तक नहीं पता होता कि माँ और बहन ने दिन मे खाना खाया या नहीं। बहन को 2 दिन से बुखार है, ये भी आज माँ से ही पता चला। घर मे सब्जी खत्म हो गयी है वो तक बाजार से लाने का समय नही है मेरे पास। पता नहीं यार, माँ कैसे सब संभाल लेती है। घर का खर्च भी निकालना होता है, दिन मे दुकान संभालती है। हमारी भी संभाल करती है। हमारी हर बात, कि हमने खाना खाया या नहीं, तबीयत तो ठीक है।”, -- मैंने बताया।

“हाँ यार, सच में, हम इतने व्यस्त हो गए है अपनी ज़िंदगी में कि घरवालो के लिए समय ही नहीं रहा अब। घरवाले पता नही कैसे सब संभाल लेते है।”, -- संदीप ने कहा।

“चल भाई चलते है, कल फिर काम पे भी जाना है। चलता हूँ घर, माँ ने भी मेरे बिना खाना नही खाया होगा। खाना तो दूर कि बात, खाना बनता ही मेरे जाने के बाद है ताकि मैं गरम गरम खा सकूँ।”, -- मैंने उठते हुए कहा।


और अपनी बचपन कि यादों को सुनाके अपने अपने घर का रुख कर लिया। 

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