Friday, December 2, 2011

बचपन

माँ की गोदी में सर रख कर सोना
माँ को अपने पास न देख कर रोना ღ☺
बचपन के वो दिन कितने मासूम थे
एक पल भी माँ की आखों से दूर ना होना ღ☺


हर रोज परियों की कहानियाँ सुनते थे
छोटी सी बात पे भाई बहन में लड़ाई होना ღ☺
करते थे हमेशा अपनी मनमानी
ख्वाहिश होती थी तो बस एक छोटा सा खिलौना ღ☺


तारा टूटने की चाहत हम करते थे
एक अजीब सी मांग मन्न में रखते थे ღ☺
थोड़ी सी देर का गुस्सा होता था
फिर वही हर रोज की तरह हसना, खेलना, बोलना ღ☺


बचपन के वो दिन कितने अलग थे
कभी नहीं सिखा हमने उदास होना ღ☺
गम, बेरुखी और तन्हाई से बहुत दूर
अलग ही था हमारा खुशियों का कोना ღ☺

2 comments:

  1. बहुत ही खुबसूरत बचपन की वो यादे थी.... और बहुत ही सुन्दरता के साथ अपने शब्दों में पिरोया है.....

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  2. अभी तो शरू हुआ है सफ़र तेरा
    न पड़े कभी गमो से वास्ता तेरा
    बहुत दूर तक है तुझ को जाना
    येही आशीर्वाद है ,तुझ को मेरा||

    खुश और स्वस्थ रहो !
    शुभकामनाएँ!

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