Saturday, December 31, 2016

किसमिस

किसमिस, कोई ५-६ साल की होगी। वो भविष्य निधि कार्यालय यानी PF Office की सीढ़ियों पर बैठी खेल रही थी। वहीं पास में किसी कर्मचारी की मेज के सामने उसकी माँ खड़ी थी। हाथ में कागज़ और माथे पर शिकन लिए अपनी बारी आने की प्रतीक्षा कर रही थी। जाने वो चिंता की शिकन थी, घृणा की या फिर क्रोध की।

मैं अपने एक मित्र, राममेहर, के साथ उसके काम के लिए वहाँ गया था। वो नयी दिल्ली स्टेशन आया और हम वहाँ से सीधा द्वारका स्टेशन की ट्रेन पकड़ कर गए। मेट्रो थी, इसी वजह से गर्मी का अहसास नहीं हुआ वर्ना बाहर तो बदन को झुलसाने वाली लू पड़ रही थी। हम लोग द्वारका स्टेशन से उतरे और रिक्शा ढूँढने लगे। बाहर आने पर सोच रहा था कि रिक्शा भी वहीं की वहीं मिल जाए। इतनी गर्मी में बाहर सड़क तक जाने की तो हिम्मत ही नहीं हो रही थी। खैर, अंदर तो कोई रिक्शा मिलीं नहीं इसलिए हम लोग सड़क पर पहुँचे। वहाँ २-३ रिक्शा खड़ी थी। उन रिक्शा चालकों में से एक कोई १४-१५ साल का बच्चा होगा।

मैंने पूछा - छोटे, PF Office के कितने लेगा?

वो बोला - ३० रुपये।

वहीं खड़ा रिक्शा वाला, जो काफी जवान था, बोला - चलिए भैया मुझे २० रुपये दे दीजियेगा।

राममेहर बोला - क्या भाई, बच्चे को भी कमा लेने दे।

हम लोग बच्चे की रिक्शा में चढ़े। कोई १०-१५ मिनट का रास्ता था। एक मैं था जो कुछ पल की गर्मी के कारण परेशान हो रहा था और एक वो बच्चा जो इतनी कड़ी धूप में भी रिक्शा चला रहा था। अभी तो उम्र से वो कच्चा ही था।

मैंने उससे पूछा - स्कूल भी जाता है कि नहीं?

"जाता हूँ।"

"कौन सी क्लास में?"

"आठवीं में।"

"कौन से स्कूल में।"

"सरकारी स्कूल में।"

उसकी आवाज में तीखापन था, जैसे वो मेरे सवालों से तंग हो रहा हो। मेरे सवाल ख़त्म हुए तो राममेहर के शुरू हो गए।

"सचमुच जाता है या झूठ बोल रहा है?"

"जाता हूँ।"

"तो फिर आज क्यों नहीं गया?"

"आज छुट्टी ले ली थी।"

"तो फिर हर रोज रिक्शा कैसे चलाता है?"

"स्कूल से आने के बाद।"

"और पढ़ाई किस समय करता है?"

"पढ़ता हूँ।"

"क्या नाम है तेरा?"

"राजा।"

"हमको तेरे बारे में सब पता चल गया है, हम तेरे स्कूल में आके देखेंगे कि तू सच बोल रहा है कि नहीं।"

"पूछ लेना।"

हम लोग PF Office के सामने उतरे, उसे पैसे दिए और अंदर चले गए। कोई सौ कदम भी नहीं चलने पड़े थे कि मैं पसीने से तर बतर हो गया था, और मेरी साँस भी फूलने लगी थी। मेरे दिल की धड़कन तेज हो गयी थी। राममेहर पूछताछ केंद्र की तरफ़ गया और मैं वहीं पास में एक कुर्सी पर बैठ गया। मैंने कुछ देर लंबी लंबी सांसें ली तब जाकर कहीं मेरे अंदर का संतुलन बना।

थोड़ी देर बाद राममेहर मुझे लेकर एक कमरे की तरफ़ गया। उस कमरे के एक कोने में काफी बड़ी उम्र के अंकल बैठे थे। वो उसी दफ्तर के कर्मचारी थे। उसके सामने एक मेज रखी थी जिस पर उसका कंप्यूटर और कुछ कागज़ात रखे थे। उसकी मेज के सामने लोग दो कतारों में खड़े थे जबकि उन्हें एक ही कतार में खड़ा रहने को कहा जा रहा था। आगे वाले लोग अपना काम निकलवाने की जल्दी में और पीछे वाले लोग अपनी बारी आने की जल्दी में थे। उक्त अधिकारी लोगों पर चिल्ला रहे थे, "सब लोग एक ही लाइन में खड़े हो जाओ वर्ना मैं काम करना बंद कर दूँगा।"

उनकी बायीं तरफ़ कुछ तीन गज की दूरी पर दो और कर्मचारी बैठे थे। उनके पास भी भीड़ जमा थी पर वो अपना काम शान्ति से कर रहे थे। शायद उन्हें नौकरी लगे ज्यादा समय नहीं हुआ होगा। इसी वजह से वो अपने काम का आनंद ले रहे थे। वहीं उसी कमरे में दरवाज़े के पास वाले एक कोने में सीढियाँ बनी हुई थी।

मैं वहाँ जाकर बैठ गया। मेरी दायीं तरफ़ वो छोटी बच्ची खेल रही थी। उसने मेरी तरफ़ देखा। मैं उसे देखकर मुस्कुराया। उसने मुह फुलाकर धीरे से अपना सर दूसरी तरफ़ घुमा लिया। कुछ पल बाद फिर मेरी तरफ़ देखा। मैं फिर मुस्कुराया। उसने एक झटके से फिर अपना सर घुमा लिया। मैं उसकी तरफ़ देखता रहा। कितना प्यारा, मासूम और चित आकर्षित कर लेने वाला चेहरा था। जब भी हम दोनों की नज़रें मिलती थी तो वो अपनी गोल मटोल सी आँखें झुका लेती थी। वो कुछ भी तो बनावटी नहीं था। मैं उसे देखते देखते खो सा गया था। जैसे मेरा उस नन्हीं सी जान से काफी गहरा रिश्ता हो। मैं अपने से जुड़ी हर बात भूल गया था। मेरे अंदर कोई अशांति, घबराहट, परेशानी और अधीरता कुछ भी बाकी नहीं था। बस एक अहसास था।

मेरी नज़र वहीं पास खड़ी उसकी माँ पर पड़ी। उसकी माँ ने भी मेरी तरफ देखा। उन्होंने बिना ये सोचे कि मैं उनकी बातों में दिलचस्पी लूँगा या नहीं, बोलने लगी, "कितने दिन हो गए चक्कर लगाते लगाते, ये लोग कोई काम करके ही नहीं दे रहे।"

मैं उसे ध्यान से सुनने लगा। उसने अपनी बात जारी रखी, "मेरे पति का एक्सीडेंट हो गया इस होली के बाद और अब दो महीने हो गए। उनके PF का पैसा आधा तो मिल गया था बाकी आधे का पेंशन में बदल रहे हैं। कभी बोलते है ये कागज़ नहीं है कभी वो नहीं है। प्रतापगढ़ से आयीं हूँ, इतनी गर्मी में मेरी बच्ची को साथ में लाना पड़ता है।"

मैंने पूछा - उनके ऑफिस में गए थे? क्या कहा उन्होंने?

वो बोली - गयी थी। वहाँ का चपरासी मेरे साथ मदद करने आया है।

तभी वो व्यक्ति वहाँ आया। वो गुस्से में था।

मैंने पूछा - ऑफिस में कोई होगा ना जो ये सब संभालता होगा।

वो बोला - है। लेकिन उसने एक जरुरी फॉर्म भरके आगे भेजा ही नहीं।

वो उसकी माँ की तरफ घूमा - उस विजय ने कोई फॉर्म नहीं दिया है। उस फॉर्म के बिना यहाँ कुछ नहीं कर सकते।

उसकी माँ बोली - कल मुझे ऑफिस लेके चलना, मैं उस विजय की खबर लूँगी।

ये देख ख़ुशी हुई कि वो व्यक्ति बिना किसी अपेक्षा के उनकी मदद कर रहा था। वो बच्ची अब मुझे देख कर मुस्कुरा रही थी। राममेहर अपने काम की पूछताछ कर वापिस आया।

मैं उसके साथ बाहर की तरफ़ चल दिया। उसके फॉर्म में नाम की गलती थी। उसके हर कागज़ में उसका अलग ही नाम था। उसके नाम की स्पेलिंग हर कागज़ में गड़बड़ थी। उसे नाम बदलने के लिए एक और फॉर्म भरना था। कुछ देर बाद हम फिर उसी कमरे में गए। बच्ची की माँ वहीं खड़ी थी लेकिन बच्ची नहीं थी। उसकी माँ ने मुझसे उसे देख आने के लिए निवेदन किया। मैं बाहर देखकर आया। वो उसी चपरासी के साथ बैठी थी। मैंने आकर उन्हें बता दिया।

राममेहर का वहाँ का काम निपट चुका था। हम लोग बाहर की तरफ गए। राममेहर अपने ऑफिस फ़ोन करने लगा। मैं तब तक इधर उधर घूमने लगा। वो बच्ची और वो चपरासी वहीं कुछ दूरी पर बैठे हुए थे। तभी उसकी माँ भी वहाँ आ गयी। मैं उनके पास गया और उस बच्ची का नाम पूछा।

"किसमिस।"

Friday, December 30, 2016

क्रिसमस, ममता घर और मिट्टी के रंग

जीवन में सबसे बड़ा सवाब का काम होता है एक बच्चे के चेहरे पर मुस्कराहट लाना। कुछ दिन पहले क्रिसमस के दिन मुझे कुछ बच्चों के साथ समय बिताने का अवसर मिला। वो बच्चे, जिनके सर माँ बाप का साया नहीं है। ममता फाउंडेशन नाम की एक संस्था है जो उन बच्चों पर अपना आशीर्वाद बनाये हुए है। मेरा मित्र अमित जैन "मिट्टी के रंग" नाम से एक संस्था चलाता है जो सामाजिक कार्य करती रहती है। उसने ही एक कार्यक्रम आयोजित किया जिसमे हमें बच्चों के लिए तोहफ़े खरीदने थे।

इस तरह का ये मेरा पहला अनुभव था। मैं और मेरा दोस्त अंकित बड़े चाव से ये सोचने लगे कि तोहफ़े में क्या देना चाहिए। हम अनुमान लगा रहे थे कि बच्चे कैसे रह रहे होंगे। सभी प्यार से रहते होंगे या हॉस्टल के बच्चों की तरह आपस में लड़ते भी होंगे। सबको अगर अलग अलग तोहफा मिला तो क्या एक दूसरे को चिढ़ाएँगे या फिर आपस में मिल बाँट कर इस्तेमाल करेंगे। इसी तरह के निरर्थक प्रश्न मन में उठ रहे थे। मेरे ही ऑफिस के दो और मित्रों विशाल और कर्निका ने भी तोहफ़े दिए। कर्निका तो मुझसे भी ज्यादा उत्साही थी। अपने तोहफों को प्यार से बनाया भी और सजाया भी।

पायल और कौस्तुभ आयोजक का कार्यभार संभाले थे। क्रिसमस का दिन और हम सब इकट्ठे हो ममता घर पहुचें। तोहफ़े बाटने से पहले चित्रकला प्रतियोगिता रखी गयी। सब बच्चों को अपनी अपनी प्रतिभा का छोटा सा नमूना दिखाना था। आधे घंटे में ही सब बच्चों ने कोरे कागज पर अपने रंग बिखेर दिए थे। कुछ ने पहाड़ बनाया तो कुछ ने चुहिया, कुछ ने दिवार पर लगे चित्रों की नक़ल की तो कुछ ने अपने मन से बनाया। एक बच्चा ने ईसा मसीह का चित्र बनाया था। चित्र में यीशु दो लोगों के बीच में सूली पर लटके हुए हैं।

प्रतियोगिता ख़तम हुई। तोहफ़े बांटे गए। सब याद के तौर पर फ़ोटो खींचने लगे। बच्चों ने तोहफ़े लिए और चटाई पर सबने इकट्ठे रख दिए। बच्चों के मन में तोहफ़े के प्रति भावना "मेरे लिए" वाली नहीं "हम सबके लिए" वाली थी। बच्चे प्यार से रहते हैं। एक दूसरे के साथ हँसी ठिठौली करते हैं। एक दूसरे का ख्याल रखते हैं। मैं उन्हें प्यार देकर ही नहीं उनसे प्यार लेकर भी आया।


Thursday, November 24, 2016

धर्म और विज्ञान

मैंने एक किताब पढ़नी शुरू की है जिसका शीर्षक है, "They Laughed at Galileo: How the Great Inventors Proved Their Critics Wrong." नाम से तो आप समझ ही गए होंगे कि किताब किस विषय में बात करती है। इस किताब में कुछ आविष्कार और आविष्कारकों से जुड़े रोचक तथ्य बताये गए हैं। उन्हीं महान लोगों में से एक इटली के भी थे, जिनका नाम था गैलिलियो गैलिली। गैलिलियो भैया बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे।

वो गणितज्ञ थे, खगोल शास्त्री थे और भौतिकी विज्ञान के भी ज्ञाता थे। एक दिन शायद उनके हाथ एक दूरबीन यानी telescope लग गयी। उस समय दूरबीन कुछ क्षेत्रों जैसे समुंद्री जहाज़, नौ सेना में काफी सहायक था। उस समय की दूरबीन से समुंद्री जहाज को २ घंटे पहले ही देखा जा सकता था। लेकिन अपने गैलिलियो भैया तो और भी अधिक दूर तक देखना चाहते थे। तो हुआ यूँ कि भैया जी ने घर बैठे बैठे एक दूरबीन बनायीं जो आसमान तक नजर रखती थी।

भैया जी अपने दूरदर्शक यंत्र से सितारों को निहारते हुए एक तारे से नैना लड़ा बैठे। उस तारे का नाम था, Jupiter यानी बृहस्पति। उन्होंने देखा कि चार तारे बृहस्पति के चक्कर लगा रहे हैं। अब भैया ठहरे खगोल शास्त्री, बस यहीं उनके दिमाग में खुजली हुई। उन्होंने पता लगा लिया कि बृहस्पति कोई तारा नहीं बल्कि एक गृह है और वो चार तारे वहाँ के चाँद है। बस फिर क्या था भैया जी ने एक किताब लिख डाली और सनसनी फैला दी।

अभी भैया यहीं रुकने वालों में से नहीं थे। अब बारी आयी शुक्र गृह की यानी Venus। अब की बार उनका ध्यान इसके आकार पर गया। शुक्र गृह का आकार बदलता रहता था। बस यहीं भैया जी का माथा ठनका। उन्हें समझते देर नहीं लगी कि धरती नहीं बल्कि सूर्य ब्रह्मांड के केंद्र में है और सब गृह सूर्य के चक्कर लगा रहे हैं। बस यहीं से समस्या उत्पन्न हो गयी। उनके विचार वहाँ के धर्म ग्रन्थ बाइबिल से टकरा गए। बाइबिल के मुताबिक़ धरती ही विश्व का केंद्र है। उससे भी बड़ी समस्या ये कि वो खुद भी बाइबिल में विश्वास रखते थे। उन्होंने ये समझाने की बहुत कोशिश की कि ये बाइबिल के विरुद्ध नहीं है। वो अपने काम को लेकर जगह जगह घूमे। अंत में उन्हें उनके काम को वहीं त्याग देने के आदेश मिले। उन्होंने भी उस समय विवाद से दूर रहना ही बेहतर समझा और अपनी ख़ोज चुपचाप करते रहे।

कुछ सालों बाद उन्होंने एक और पुस्तक लिखी जिसका शीर्षक था "Dialogue Concerning the two Chief World Systems". इस पुस्तक में उन्होंने अपने विचार फिर से रखे। अपनी तरफ से उन्होंने हर संभव कोशिश की कि पुस्तक विवादों में ना फसे पर ऐसा हुआ नहीं। बाइबिल को गलत बताने के जुर्म में उन्हें आजीवन कारावास झेलना पड़ा। और कुछ साल बाद ही वो स्वर्ग सिधार गए।

Tuesday, November 8, 2016

मुस्कान

सुबह, दोपहर, शाम,
मैं जब भी
बाहर निकलता हूँ,

कुछ नन्हें हाथ
मेरे बाजूओं
को पकड़
खींचनें लगते है।

मैं उनकी
मुरझाई
मासूम शक्लों
को देखता हूँ।

कुछ की नजरों में
मुझे
उम्मीद दिखती है,
कुछ के हाथों में
जिम्मेदारियाँ,

खाली पेट
जिम्मेदारियाँ।

कभी कभार,
मैं उनकी भूख
बाँट लेता हूँ,

और उनकी आँखों की चमक,
उनके होठों की मुस्कान
देख
मुस्कुरा लेता हूँ।

Friday, October 21, 2016

Why I do Trekking...?

My friends often ask me, "Why do you trek?" I become speechless. I don't know how to convince them. I am not good at convincing people by arguments. I think thats why I started writing. So, here I am writing about my experience of trekking.

Two years back, I got the job in QED42, Pune. Before that, I lived in my hometown. I never experienced hostel life, school/college tour or any kind of adventurous activity. I didn't even know the word "Trekking". I am from a small village and I used to travel by bus from my village to Hisar (Haryana), where I had my college and my first company where I worked for three years. Then I moved to Pune.

Pune was like new world to me. In QED42, boss was like a friend. Employees were motivator rather than competitor to each other. Just after one month of my joining, I was invited to our office's annual retreat. Here I got to know about trekking. We did other activities as well like jungle safari, rock climbing, rappelling and rafting. But the most amazing thing for me was trekking. I fell in love with mountains after that. Mountains taught me how to live.

I have learnt following lessons of life from trekking:

Grateful: You learn to appreciate everything and everyone in our life. You learn to respect the nature. You learn to thank yourself.

Overcome Your Fear: You may see many blockers and ridges while trekking. It becomes risky sometimes to cross those ridges. Here we learn to concentrate in our difficult situations. We have confidence to face any problem of our life.

Helping Hands: You will meet selfless people who are there to help you, to save you. You are also one of them.

More in Less: You learn to be happy with what you have. You learn to survive in difficult phase of your life.

Independent: You are out of your comfort zone. You don't have to expect anything from anyone. You can achieve everything.

Keep Moving Forward: Once you started, you don't want to look back.

Enjoy Your Journey: The path you are walking on is more important and memorable than the destination.

Friends for Life: You meet a lot of people in your journey. Few of them becomes friends for the lifetime. I have met few amazing personalities while trekking. But there are two that I want to mention, Sanket and Suyashi. Sanket, is the most humble person I have ever seen. He works like 18hrs a day to follow his dreams but still he is just a call away from me. Suyashi, I met her once only but talked to her a lot. I am not sure what to say about her, but she is a unique girl (though girl things don't suits her :P).

Love Yourself: While trekking you are with everyone but still you are with yourself. For me, mountains are the best place where I get to know about myself. It is like meeting a new amazing person who lives inside us. I promise you will meet a new you every time you go on a trek.




Sunday, September 18, 2016

पालिका बाजार की शाम

इतवार का दिन था, सोचा दिल्ली घूम आयें। जाना चाहता था ग़ालिब की हवेली पर पंकज ले गया पालिका बाजार में। कहने में कोई शर्म वाली बात नहीं कि हम तो भाई पालिका बाजार के स्टैण्डर्ड वाले ही बन्दे हैं। वहाँ जाकर देखा कि दिल्ली के डूड लड़के और लड़कियाँ जो अक्सर अपने सादगी पसंद मित्र को स्टाइल में रहने का भाषण देते हैं, वहीं पर अपना फैशन खरीद रहे थे। ख़ैर, हमें क्या लेना देना इन बातों से; हमे तो शॉपिंग करनी थी, अरे हाँ मुझे नहीं सिर्फ पंकज को शॉपिंग करनी थी। उसे ज़ुराबें लेनी थी। कमीना!!! सिर्फ जुराबों के लिए गुडगाँव से दिल्ली ले गया। लेकिन उसने जुराबें भी नहीं ली।

बाजार में दुकानदार लोग आवाज़ें दे देकर बुला रहे थे। जिस दुकान की सजावट थोड़ी अच्छी दिखती हम घुस जाते। टी-शर्ट, शर्ट वगरैह देखने लगते। लेना देना कुछ था नहीं, बस यूँ हीं आये थे तो कुछ तो करना था। बस ऐसे ही एक दुकान पे एक कमीज़ ट्राई की, वापिस दूकानदार को दी और आगे चलने लगे।

दुकान वाला पीछे से चिल्ला कर बोला - "अरे बताओ तो क्या हुआ?"

हम उसकी तरफ मुड़कर मुस्कुराये और फिर चलते रहे।

वो फिर बोला - "आओ तो, और साइज में दिखाता हूँ

"अरे भाई! क्या हुआ?

"ऐसे शॉपिंग करते हो क्या आप लोग?

"भाई!!

"अरे भाई!!"

वो चिल्लाता रहा और हम उसकी तरफ ध्यान दिए बिना ही हँसते हुए चलते गए। कुछ दूर तक तो ऐसे लगा जैसे वो हमारे पीछे ही आ रहा है। पर नहीं, हम जैसे बहुत महारथी थे वहाँ।

आगे चलते हुए एक बैग देखा। मैंने पूछा - "कितने का दिया?"

"1100 का भाई।"

कुछ देर बैग को देखा, अच्छा लगा। लेकिन पालिका बाजार की एक खास बात है, दुकानदार पहली बार में ऊँचा दाम ही बोलता है। हम बैग छोड़ जाने लगे। उसने पीछे से आवाज दी - "भाई, 350 में दे दूँगा।" फिर जो हँसी निकली हमारी बस पूछिये मत। मैं वापिस उसके पास गया और पूछा - "कितने का बोले भाई?"

"अभी तो बताया था भाई, 1100।"

फिर तो हम निकल ही गए। वो पीछे से चिल्लाता रहा। बस अब कुछ नहीं बचा था हमारे लायक वहाँ, हम चले मेट्रो स्टेशन की ओर।

राजीव चौक मेट्रो स्टेशन से अगर ट्रेन में बैठने को जगह मिल जाये तो..... खैर!!! हमें क्या! हमें कौनसा जगह मिलती है।

Monday, June 27, 2016

विचलित मन

विचलित मन
चाहता है
सपनों की राह बदलना।

पर घबराता है
यह सोचकर
जीवन कठिन है।

फिर ठिठक कर
कुछ पल
ठहर जाता है।

सपनों की नयी राह पर
डगमगाता सा
बढ़ने लगता है।

यह सोचकर
जीवन एक ही बार मिलता है।

Thursday, June 2, 2016

काकू की कहानी

सुबह का समय था। चाँद छिप चुका था लेकिन सूर्योदय अभी तक नहीं हुआ था। काकू गहरी नींद में था। वो एक सपने में खोया हुआ था। काकू को बहुत जोर का पेशाब लगा। उसे अपने सपने में भी उतनी ही जोर का पेशाब लगा। काकू पेशाब करने नहीं उठा। उसने सोचा कि सपने में ही लगा है।

सपने में वो जगह ढूंढने लगा जहाँ वो हल्का हो सके। एक जगह मिल गई और उसने कर दिया। अभी काकू को हल्का गरम सा कुछ महसूस हुआ। काकू की नींद टूट गई। बस इस तरह काकू हर रोज बिस्तर गीला कर देता है।

Sunday, May 22, 2016

जिम्मेदारी

जीवन में कई दफा ऐसे वाकये हो जाते हैं जो हमें अंदर से झकझोर के रख देते है। अगर हम गौर करें, तो उनका असर कहीं न कहीं हमारे अंदर कुछ अच्छा परिवर्तन ला ही देता है। इनमे बहुत से वाकये जुड़े होते है उन लोगों से जिनके लिए हम समझते है कि ऐसा जीना भी कोई जीना है। हमारे दिल में उनके लिए दया की भावना पैदा हो जाती है। पर हम उन लोगों के लिए कुछ कर पाएं या नहीं, लेकिन वो लोग हमारे जीवन में गहरी छाप छोड़ जाते हैं। ऐसा ही एक वाकया मेरे साथ हुआ जब मैं मुंबई की लोकल ट्रेन में सफर कर रहा था।

मैं मुंबई पहली बार आया था, तो मैं वहाँ के तौर तरीकों से वाकिफ नहीं था। मैं अपना मुंबई का सफर कम से कम बजट में रखना चाहता था। हम जितनी बार किसी सफर में निकलते हैं तो कोई ना कोई ऐसी बात या आदत सीखकर आते है जो हमारे जीवन के कठिन पहलू में बहुत काम आती है। उन्ही में से एक आदत थी जो मैंने सीखी, वो है कम से कम खर्चे में गुजारा करना। इसका मतलब ये कतई नहीं कि मैं कंजूस हो गया। इसका मतलब है कि जब भी मैं कठिन समय से गुज़रूँ तो संयम से काम ले सकूँ। मुंबई का सबसे सस्ता परिवहन वहां की लोकल ट्रेनें है। मुझे एक इवेंट के सिलसिले में IIT जाना था। मैं अपने एक दोस्त पंकज के साथ जा रहा था। हमसे कहा गया था कि २-३ दिन के लिए मुंबई आये हो तो टैक्सी से जाओ वर्ना ट्रेन में तो परेशान हो जाओगे। फिर भी हमने ट्रेन में जाना ही उचित समझा।

हम लोगों को बेलापुर स्टेशन से ट्रेन पकड़नी थी और कांजुर मार्ग स्टेशन तक जाना था। बेलापुर स्टेशन पर हम लोग ट्रेन की प्रतीक्षा कर रहे थे। हमने सुना था कि ट्रेन में चढ़ने या उतरने की जरुरत नहीं है, बस खिड़की के सामने खड़े हो जाना सब अपने आप हो जायेगा। हम लोग प्लेटफार्म पर खड़े थे लेकिन वो भीड़ दिख नहीं रही थी जिसकी हमें आशा थी। प्लेटफार्म खाली खाली सा देखकर अच्छा ही लगा। थोड़ी देर के इंतजार के बाद ट्रेन आई, और ना जाने कहाँ से भीड़ भी टपक पड़ी। पलक झपकते ही हम ट्रेन के अंदर थे। हमें चढ़ने के लिए सच में कोई मेहनत नहीं करनी पड़ी थी। वो तो हम धक्का मुक्की कर अंदर की तरफ सरक गए, वर्ना अगले स्टेशन तक शायद दूसरी खिड़की से बाहर भी निकाल दिए गए होते। इतनी भीड़ थी कि अगर हम अपने दोनों पैर उठा भी लेते तो ज्यों के त्यों खड़े रहते।

मैंने वहीं खड़े एक व्यक्ति से पूछा - भैया, हर रोज इतनी ही भीड़ होती है क्या?

उसने कहा - आज कम है।

"हैं!!! कम है?"

"आज सबको छुट्टी है ना, इसलिए कम भीड़ है।"

"अरे बाप रे बाप!!!"

हम लोग कुर्ला स्टेशन पर उतरे जहां से हमें कांजुर मार्ग स्टेशन की ट्रेन पकड़नी थी। उधर जाने वाली ट्रेन में कोई ख़ास भीड़ नहीं थी, बल्कि हमें तो बैठने को जगह भी मिल गई थी। हम जिस डिब्बे में थे उसमे बहुत कम लोग थे, अधिकतर सीटें तो खाली ही पड़ी थी। कोई २-४ लोग फिर भी खिड़की में खड़े होकर यात्रा कर रहे थे। लोकल ट्रेन में लोग सीट पर बैठने से ज्यादा खिड़की पर खड़े होना पसंद करते हैं। मैंने भी एक बार खिड़की में खड़े होकर यात्रा की, तब इस बात का राज समझ आया। ठंडी ठंडी हवा जब चेहरे को छुए और दूर दूर तक मुंबई के हसीं नजारे देखने को मिले तो कौन सीट पर बैठना पसंद करेगा। कुर्ला से कांजुर मार्ग का सफर कुछ ही देर का था पर उस बीच मैंने उन बच्चों को देखा जो मुझसे बिना कुछ बात किये एक गहरी सीख देकर गए।

मैं अपनी ही किसी सोच में बैठा था। तभी करीबन ६-७ साल का एक बच्चा उस डब्बे में चढ़ा। शायद एक मैली सी कमीज और नेकर पहने था। उसका हाथ पकडे उससे कोई २-३ साल बड़ा एक और बच्चा चढ़ा। वो भी कुछ ऐसे ही मैले कुचैले कपडे पहने था। उन दोनों के चढ़ने के पश्चात उनसे बड़ा एक और लड़का उनके साथ चढ़ा। उसकी उम्र कोई १४-१५ साल रही होगी। उसके हाथ में एक झाड़ू थी। वो उन दोनों बच्चों को एक सीट पर बैठाकर डिब्बे में झाड़ू लगाने लगा। वहां लगभग हर व्यक्ति उनकी तरफ देख रहा था। कोई कोई तो उनकी तसवीरें भी खींच रहे थे। शायद हर किसी के मन में उनके लिए दया भाव था। वो लड़का हर किसी के पैरों के पास से झाड़ू लगता और हाथ फैला कर पैसे मांगने लगता। कोई उसे रुपया दो रुपया देता तो कोई नहीं भी देता था। वो अपना काम किये जा रहा था।

मैंने भी उसे कोई २ रुपये दिए होंगे। मैं अक्सर किसी को भीख नहीं देता। लेकिन अक्सर ऐसे लोग मिल ही जाते हैं जो गाकर, बजाकर या फिर जैसे ये बच्चा झाड़ू लगाकर पैसे मांग रहा था। तब पता नहीं क्यों लेकिन मैं उन्हें जरूर ही कुछ का कुछ दे देता हूँ। वो सबके पास एक बार चक्कर लगा चुका था और फिर अपने छोटे दोस्तों, या शायद उसके भाई होंगे, उनके पास जाकर बैठ गया। उसने मिले हुए पैसे सम्भाल कर रख लिए। अगले स्टेशन पर वो अपने भाइयों को बड़े ही ध्यान से उतारकर उतरा। शायद वहां से किसी दूसरी ट्रेन के किसी डिब्बे में फिर से चढ़ा होगा।

मैं उसके बारे में काफी देर तक सोचता रहा। पिद्दी सा बच्चा था वो। उसकी उम्र में शायद मैंने अपने आप से नहाना भी नहीं सीखा था। वो टिंगू सा बच्चा अपने दो दो भाइयों की जिम्मेदारी सम्भाले दिन भर पचासों ट्रेनों में चढ़ता उतरता होगा। उसके माँ बाप ने उसे तो भेजा ही लेकिन उन दो नन्हे से बच्चों को क्यों भेजा? या फिर उनका इस दुनिया में कोई नहीं था? तो फिर वो बच्चे कैसे रहते होंगे? क्या वो छोटू अपने बड़े भाई से खिलौनों की जिद्द करता होगा या उसकी परेशानी समझता होगा? और वो मंझला, वो भी तो नए कपड़े लेने की जिद्द करता होगा या वो भी अपने भाई जितना ही जिम्मेदार बच्चा था? वो खुद, उसे भी अच्छा अच्छा, तला हुआ, नमकीन, महंगा खाने का मन करता होगा या नहीं? वो दिनभर कमाएं चंद सिक्कों में कैसे गुजर करते होंगे?

इन सब सवालों ने मुझे झकझोर के रख दिया था। कुछ देर बाद मैं खुद मेरे ही सवालों के दायरे में खड़ा हो चुका था। क्या मैं खुद अपनी जिम्मेदारियां निभा रहा हूँ या उन्हें छोड़कर भागता फिरता हूँ? वो बच्चे, जिन्हे शायद उन सिक्कों से प्यारा और कुछ नहीं था, जाने मेरे जैसे कितनों के लिए ही एक सबक दे कर गए होंगे। मैंने २ रुपये देकर उनकी कोई मदद नहीं की थी। मैं तो खुद को उन बच्चों की मदद करने के लायक भी नहीं समझता। मैं, जो खुद की मदद नहीं कर सकता, किसी और की क्या मदद करूंगा। वो बच्चा मुझे २ रुपये के बदले एक अनमोल सीख दे गया।

Friday, May 20, 2016

त्रिउंड - SOLO Trip

पहली बार किसी सफर में अकेला जा रहा था। थोड़ी घबराहट थी, लेकिन उत्साह भी था। यूँ तो मैं कभी अकेला कहीं घूमने नहीं गया था। जब भी गया किसी ना किसी दोस्त के साथ गया। मैं सोचता था कि, "अकेले घूमने जाने का मतलब ही क्या है? वहां किसके साथ मस्ती करेंगे?" मेरे बहुत दोस्त है जो अकेले घूमने जाते हैं, या अंग्रेजी में बोले तो "SOLO Trip" करते हैं।  मुझे लगा कि एक दफा मुझे भी जाकर देख ही लेना चाहिए। फिर भी हिम्मत नहीं बनी। मैंने अपने साथ चलने के लिए कुछ मित्रों से पूछ ही लिया। एक दोस्त राजी हो गया और मैंने हम दोनों की टिकट ले ली। वो एक दिन पहले जाने से मना कर गया। फिर मैंने मन बना लिया कि मैं अकेला ही जाऊंगा। पहाड़ों में घूमने जाना था तो बहुत खोजबीन कर एक जगह चुनी, त्रिउंड (Triund)। त्रिउंड उस पहाड़ी जगह का नाम था जो मैक्लोडगंज (धर्मशाला, हिमाचल प्रदेश) में पड़ती है।

दिल्ली से धर्मशाला कोई बारह घंटे का सफर था। खाने की कुछ दिक्कत ना हो इसलिए दिल्ली बस अड्डे से मैंने चार पराठें पैक करवा लिए थे। कोई एक घंटा इंतजार करने के बाद बस आई। बस में ऐसी जगह मिली जहां मेरे एक तरफ वाला आदमी पिया हुआ था (जो जगह मैंने अपने दोस्त के लिए ली थी और फिर रद्द कर दी थी।) और सामने वाले की सीट की कमर मेरे घुटनों में लग रही थी। सुबह सुबह कोई धर्मशाला से अढ़ाई घंटे पहले किसी गावं में बस खराब हो गई। हम सबको दूसरी बस में भेजा गया। कुल मिलाकर बस के सफर में थोड़ा तंग ही रहा।

कोई सात बजे मैं धर्मशाला पहुंचा। वहां अपने सुबह का कुदरती काम निपटाया ताकि रस्ते में कोई तकलीफ ना हो। वहाँ से मैक्लोडगंज की बस ली। बस में ब्राज़ील और इटली की दो महिलाओं से मुलाकात हुई। उन्हें मैक्लोडगंज से धर्मकोट जाना था तो मुझसे पूछ रही थी कि कैसे जाना है। मुझे भी अपना ट्रैक वहीं से शुरू करना था। मैक्लोडगंज से धर्मकोट की कोई बस नहीं थी। वहाँ सिर्फ ऑटो या टैक्सी ही चलती है। टैक्सी थोड़ी महंगी थी इसलिए एक ऑटो लिया और हम तीनों ही धर्मकोट के लिए निकल पड़े। रस्ते में हमनें बहुत सी बातें की। उन्होंने मेरे बारे में कुछ पूछा, मैंने उनके बारे में कुछ पूछा। वो लोग योग के दस दिन वाले शिविर में आईं थी। विपासना (Vipassana) नाम से कोई संस्थान है जो १० दिन का योग शिविर करवाता है। जानकारी के लिए बता दूँ ऐसी बहुत सी संस्थायें है जो ऐसा शिविर लगाती रहती है। कुछ पैसे लेती है और कुछ मुफ्त में करवाती है। खाना, पीना व रहना सब उनके शिविर में ही होता है।

वो लोग मुंबई में किसी ३ महीने का योगाभ्यास करके आयीं थी, जहाँ उन दोनों की मुलाकात हुई थी। कुछ ही देर में हम लोग धर्मकोट पहुचें। उनका शिविर अगले दिन से शुरू होना था। उन्हें उस दिन रहने के लिए कोई कमरा चाहिए था। उन्हें हिंदी तो आती नहीं थी तो उलझन में थी कि वहाँ रहने का इंतजाम कैसे हो। मैंने उनकी थोड़ी मदद की और उन्हें एक कमरा दिलवाया। उन्हें वहां खाने पीने के बारे में सब समझा दिया। उन्होंने मुझे मदद के लिए धन्यवाद किया और गले लगाकर विदा किया। 

वहां से मैं एक दुकान में नाश्ता करने गया। वहाँ खाना थोड़ा महंगा था लेकिन वो जगह बहुत अच्छी थी। अंदर वाले कमरे में थोड़ा शाही माहौल था, बैठने के लिए गद्दे बिछे थे और कम ऊंचाई वाली मेज रखी थी। वहीं एक रैक पर कुछ किताबें, लकड़ी की कुछ शतरंज और ताश के पत्ते रखे थे। वहाँ का मालिक हिंदी, अंग्रेजी और हिमाचली भाषा तो जानता ही था और कुछ एक बाहर देशों की भाषाएं भी जानता था। 

नाश्ता करने के पश्चात निकला ही था की कुछ ही दूर एक दम्पति भक्ति गीत गा रहा था। मैं कोई खास धार्मिक इंसान तो नहीं हूँ लेकिन फिर भी उनकी आवाज इतनी सुरीली थी कि मैं मंत्रमुग्ध हो गया था। मेरे कदम अपने आप धीमे हो चले थे ताकि मैं उन्हें कुछ देर तक सुन सकूँ। मेरा वहां रुकने को मन हुआ लेकिन फिर देखा कि कोई भी वहां नहीं ठहर रहा था। मैं भी मारे शर्म के उनके डब्बे में १० रुपये डाल कर बिना रुके चल दिया। काश! मैंने वहां रूक कर उन्हें कुछ देर सुन लिया होता। जिंदगी में ऐसे बहुत से छोटे छोटे पल आते हैं जिन्हे हम अनदेखा कर देते हैं लेकिन वो पल हमारी जिंदगी के कुछ खूबसूरत पलों में से एक होते हैं। उन्हें थोड़ा सा ही सही लेकिन सुनने के बाद अंदर की घबराहट बिलकुल ही खत्म हो गई थी और मेरा उत्साह दुगुना हो गया था। 

रास्ते में मैं ऊपर रहने के बारे में सोचता जा रहा था। बस में, धर्मशाला बस अड्डे पर और धर्मकोट में भी बहुत लोगों से पूछा कि रहने का इंतजाम कैसे होता है? कोई बोलता था Travel Agent के साथ चले जाना, कोई बोलता नीचे से तम्बू लेते जाना और कोई बोलता कि वापिस नीचे चले आना। मैंने बिना कुछ लिए चढ़ाई शुरू कर दी थी। सबसे पहले मुलाकात हुई ३ पंजाबी लड़को से, बड़े मस्त मौला लड़के थे। पूछने पर पता चला कि पिछले साल में छब्बीस बार वहाँ आ चुके हैं। उनसे बड़ी जल्दी ही दोस्ती हो गई थी। आधे रास्ते तक तो कभी वो लोग आगे रहते और कभी मैं आगे रहता। वहाँ दिन के समय धूप बहुत ज्यादा थी इसलिए मैं बहुत रुकता हुआ जा रहा था। हमारा साथ रास्ते में ही छूट गया। चलते चलते कुछ ऐसे लोग मिलें जिन्हे देखकर प्रेरणा मिलती थी। एक अंकल जी थे जो अपनी पत्नी और बेटियों के साथ आये थे। कुछ लोगों की एक  टोली थी जिनमे एक बड़ी उम्र का भोला भाला लड़का था जिसकी समझ एक बच्चे के जैसी ही थी। एक और व्यक्ति जिसे चलने के लिए लाठी का सहारा लेना पड़ रहा था। कुदरत ने उसके पैर को तो कमजोर बनाया पर उसके हौसलों को नहीं। बाकी अलग अलग टोलियों में लोग जा रहे थे जिनकी हंसी ठिठोली के सहारे मेरा रास्ता बड़े मजे से गुजरा। 

मैं करीब शाम के ३ बजे ऊपर पहुँचा। ऊपर का मौसम ऐसा था कि धूप में तो गर्मी लगती थी और छांव में ठण्ड लगती थी। शनिवार का दिन था तो वहाँ बहुत से लोग आये थे। पहाड़ के एक तरफ से दूसरी तरफ, हर जगह तम्बू लगे थे। मैं कोई अच्छी सी जगह देखकर बैठ गया। वहाँ बैठे बैठे दो और दोस्त बन गए थे। एक तो मेरी ही तरह कविता प्रेमी था। उनके साथ काफी देर तक रहा। फिर मुझे अपने तम्बू लेना था तो मैं भी सबसे सस्ते के चक्कर में इधर उधर घूमने लगा। कुछ देर बाद मुझे तम्बू मिल ही गया और मैं निश्चिन्त होकर वहीं पास में एक बड़े से पत्थर पर बैठ गया। कितनी शान्ति थी, सुकून था। तभी कुछ देर बाद एक और टोली आयी। 

पांच लोग आये थे जिनमे से चार तो पंजाब के थे, इसलिए उनमे मसखरापन तो स्वाभाविक ही था। पाँचवा, अंकित, अहमदाबाद (गुजरात) का था अकेले आया था। हम जल्दी ही अच्छे दोस्त बन गए। वो कुछ दिनों बाद से दिल्ली में ही रहने वाला था तो हमारी भविष्य यात्रा के भी कार्यक्रम बनने लगे। शाम को वहाँ ठण्ड बहुत बढ़ जाती है। चूँकि वो लोग एक गाइड के साथ आये थे तो उनका रात का कार्यक्रम तय था। मैंने भी उनके साथ ही रहने का मन बना लिया था। अँधेरा हो चला था। आसमान एकदम साफ़ था। चाँद एकदम नयी नवेली दुल्हन की तरह खिला खिला सा था। उनके गाइड ने लकड़ियां जला दी और हम लगभग १५-२० के करीब लोग इकट्ठा हो गए थे। सब अपनी अपनी टोली के लोगों से बातें करने में लगे हुए थे। उन्ही पंजाबियों की करामात थी कि सबने अंताक्षरी खेलना शुरू कर दिया। गाते बजाते कब रात के बारह बज गए, पता ही नहीं चला। आग बुझ गई थी। हम सब लोग किशोर दा वाला "चलते चलते" गीत गाकर अपने अपने तम्बू में चले गए।हालाँकि ये गीत हम सब से शायद ४-५ बार गाया होगा लेकिन सब लोग जाने की बजाय फिर से गाना शुरू कर देते थे। उस रात हम सब लोग एक दूसरे से एक अद्भुत रिश्ते में बंध गए थे। वो संगीत की ही ताकत थी जिसने कुछ अंजान लोगों को जोड़े रखा। वैसे अगले दिन एक बात का पता चला कि कोई लड़की अँधेरे में किसी की कुदरती करामात (मल) पर बैठ गई थी।

अगले दिन मैं सुबह सुबह जल्दी ही उठ गया था। बर्फ से ढकी पहाड़ियां चमक रही थी। ठंडी ठंडी हवा के झोंके चेहरे को छू रहे थे। कुछ ही देर में सब लोग उठ गए थे। कुछ सुबह का आनंद ले रहे थे और कुछ तसवीरें खींचने का। उस दिन सबको शाम में अपने अपने घरों के लिए निकलना था। हम लोग सुबह ही नीचे उतरने वाले थे। धर्मशाला से दिल्ली की बसें रात में चलती है। इसलिए मैं पूरा दिन ख़ामख़ा व्यर्थ ना करना चाहता था। मुझे पता चला था कि उतरकर कोई १ घंटे के ट्रैक के बाद एक झरना है। मैंने वहां जाने का मन बनाया। अंकित की बस भी शाम को ही थी। झरने से वापसी का समय सुनिश्चित करके हम नीचे उतरने लगे। रास्ते में वही लोग मिले जो रात में गा रहे थे। कुछ देख के मुस्कुरा देते और कुछ सीधे चले जाते।

हम लोग नीचे उतर रहे थे, बीच में थोड़ा रुक भी रहे थे। एक लड़की कानों में विद्युत ध्वनि यंत्र यानी Earphone लगाए अपनी मस्ती में चली जा रही थी। हमें देखकर उसने हेल्लो बोला और हमारे जवाब की अपेक्षा किये बिना ही आगे निकल गयी। ध्यान से देखा तो ये भी पिछली रात हमारे साथ गा रही थी। वो ही अकेली ऐसी लड़की थी जिसे सबसे ज्यादा गीतों के बोल पता थे। हम लोग दो पंक्तियाँ गाकर चुप हो जाते और वो गाती रहती। फिर देखती सब चुप है तो वो भी चुप हो जाती। मुझे लगा था कि बड़ी मासूम सी लड़की है। वो तो उस दिन हमारी कुछ बातचीत हुई तो पता चला कि एकदम चंडाल लड़की है। वो अकेली नहीं थी, वो ३ लडकियां थी जो अपने गाइड के साथ आयीं थी। उनमे से एक ही लड़की ऐसी थी जो जैसी मासूम दिखती थी वैसी ही थी। हम लोग एक साथ ही नीचे पहुचें। 

हम लोगों ने थोड़ी बातें की फिर बताया कि हम झरने की तरफ जा रहे है। वो और उसकी सहेलियां भी तैयार हो गयी। उन्होंने अपने गाइड से साथ चलने को कहा तो वो मना कर गया। फिर उन्होंने बिना गाइड के ही हमारे साथ चलने का निर्णय लिया। अपने गाइड को बोलकर उन्होंने दिल्ली की टिकट करवाई तो गाइड उनसे वहीं खड़े पैर पैसे मांगने लगा। उनका गाइड उनकी ऐसी मट्टी पलीद गया कि क्या बताऊं। खैर, हम लोग झरने की तरफ चलना शुरू हुए। हम ५ लोग थे, ३ तो वही चांडाल चौकड़ियां (आयुषी, सुएशी, शिवि) और बाकी हम २ मासूम से लड़के (अंकित और मैं )।

वो लोग पहली बार ट्रैकिंग करने आये थे और मेरा तजुर्बा इस मामले में उनसे ज्यादा था। सुएशी कभी तो मुझे माउंटेन मैन कहती तो कभी बन्दर कहती। हम लोग कुछ १ घंटा बाद झरने पर पहुचें। वहां जाते ही अंकित ने एक विदेशी महिला को देखते ही बोल दिया - "ये तुम लोगों की भाभी है।" बस ये कहकर उसने अपनी पहली बेइजत्ती तो वहीं करवाली थी। हम लोग अपना अपना बैग वहीं छोड़कर झरने की ओर चले गए। पहाड़ के एक कोने में झरना गिर रहा था। झरने के आगे एक छोटा सा तालाब था जिसमे कहीं कहीं पत्थर रखे थे। पत्थर पर चढ़कर आराम से खड़े रह सकते थे वर्ना पानी सर के ऊपर से था। आस पास बर्फीले पहाड़ों से बर्फ पिघलकर झरने का रूप ले रही थी। पानी इतना ठंडा था कि तीर की तरह चुभता था। लेकिन उत्साह ऐसा था कि फर्क नहीं पड़ता था। सुएशी को तैरना अच्छे से आता था। वो ही हमें झरने के नीचे तक ले गई। उसे देखकर लग रहा था कि वो गलती से लड़की बन कर पैदा हुई। झरने का पानी सर पर आशीर्वाद की तरह लग रहा था। उससे ज्यादा आनन्दयी वहां कुछ भी नहीं था। थोड़ी देर बाद हम लोग पानी से बाहर निकले। हम सभी ठण्ड के मारे थर्र थर्र कांप रहे थे। पानी से बाहर निकल कर वहीं गए जहां अपने बैग रखे थे। बस वहीं सबके असली रंग ढंग पता चले। 

अंकित इंजीनियरिंग लाइन में होकर भी जिसे सेल्फी तक नहीं खींचनी आती थी। यहां उसने फिर से अपनी बेइजत्ती करवाई। शिवि, जो बस यही गिन रही थी कि दूसरे लोगों ने हमें कितनी बार नकारा है और फिर कहती - "करवाली बेइजत्ती।" आयुषी, जैसी दिखने में मासूम थी वैसी ही मासूमियत भरी उसकी बातें थी। अकेली वही थी जो किसी की बेइजत्ती नहीं कर रही थी। सुएशी, हमारी टोली की सबसे खतरनाक लड़की थी। वो हम सबकी कुछ न कुछ लगती थी। उसने वहां एक चित्रकार महोदय को देखा जो भारतीय लग रहे थे और उनकी पत्नी बाहर देश की महिला थी। सुएशी को भ्रम हुआ कि वो कोई मशहूर हस्ती हैं। वो उनसे बात करने के लिए उतावली हुई जा रही थी। झरने पर बात करने का एक मौका मिला लेकिन वो उसने ये सोचते सोचते खो दिया कि बात करे या ना करे। उसकी शक्ल देखने लायक थी। हम लोग नीचे उतरे तो रास्ते में चाय की दूकान पर उन महाशय से फिर मुलाकात हो गयी। मैंने सुएशी को इशारा किया। वो पहले तो बहुत उछली, फिर थोड़ा होश सम्भाला। उसने "hello sir" बोला लेकिन उसकी आवाज ऐसे थी जैसे गले में कुछ फस गया हो। फिर मैंने उन महोदय को इशारा किया। लेकिन बेचारी की किस्मत, ये तो कोई और ही महाशय निकले। सुएशी के आवेश की जो झंड हुई, बहुत मजा आया। 

रास्ते में हम लोगों के पास पानी खत्म हो गया था। वहाँ रास्ते के साथ साथ एक मोटी सी नली जाती थी जो झरने का पानी गांव तक पहुँचाती थी। भाग्य से एक जगह उस नली से पानी थोड़ा थोड़ा निकल रहा था। पानी का बहाव इतना था कि हम अपनी बोतलें आराम से भर सकें। मैं अपनी बोतल लेकर पानी भरने लगा। अंकित अपने बैग से बोतल निकालने लगा। उसने बैग खोला ही था कि जबरदस्त दुर्गन्ध फैली। दुर्गन्ध ऐसी थी जैसे अपने बैग में कोई लाश डालकर ले जा रहा हो। कुछ पल के लिए तो हम लोग अपना होश भूल गए थे। कुछ दूर तक दुर्गन्ध भी हमारे साथ साथ चली। कुछ देर में हम सब नीचे पहुचें जहां से सबको मैक्लोडगंज जाना था। हम लोग कोई ५ बजे मैक्लोडगंज वापसी पहुंचे। अंकित की बस ६ बजे मैक्लोडगंज से थी और मेरी ६:१४ धर्मशाला से थी। मैंने तो समय पर पहुंचा लेकिन बस देर से आई। बस में चढ़ा तो देखा अंकित भी उसी बस में है। हम खुश थे कि हमारा दिल्ली तक का साथ हो गया। इतना चलने और झरने के ठन्डे पानी में रहने के बाद थकान बहुत हो गयी थी। मैं तो बस घड़ियाँ गिन रहा था कि कब दिल्ली पहुचें और मैं आराम करूँ। थकान इतनी थी कि बस में भी बिना किसी तकलीफ के नींद आ गयी।

सुबह जैसे ही दिल्ली पहुचें, वहाँ से मेट्रो स्टेशन के लिए रिक्शा लिया। मेट्रो स्टेशन पहुंच कर पता चला अंकित महाशय अपना बटुआ बस में ही गिरा आये हैं। मुझे वहां बैठाकर वो अपना बटुआ लेने चल दिया। करीब आधे घंटे के बाद अपना बटुआ लिए वापिस आया। जब मेट्रो स्टेशन से बाहर निकलना था तो टोकन लेने वाली मशीन ख़राब हो गई थी। वहां भी बहुत देर तक रुकना पड़ा। कुल मिलकर अंकित भाई पर मनहूसियत छाई हुई थी। फिर मैं उसे अपने घर आराम करने के लिए ले गया। 

इन लोगों के साथ मैंने कुछ लम्हों में जिंदगी को जिया था। इस सफर में मैं तरह तरह के लोगों को देखा, उनसे मिला, उन्हें जाना। मैं अकेला ही सफर पर निकला था, पर वापिस लौटा कुछ प्यारे दोस्त और कुछ मीठी यादें लेकर।