Wednesday, December 6, 2017

उम्मीदें

उम्मीदें
माना कि तकलीफ़ें
भी देती हैं

पर उम्मीदें
ख़ूबसूरत होती हैं।

Thursday, November 23, 2017

ख़ामोशी

"माँ! माँ!"

गर्मी की भरी दोपहर थी। ना तो घर में बिजली थी और ना ही हवा चल रही थी। वातावरण में गहरी ख़ामोशी छायी थी। बच्चा नींद से उठा ही था। अपनी माँ को घर में ना पाकर वो घबरा गया। उसने गली में निकल कर देखा। गली सुनसान पड़ी थी। वो सहमा हुआ सा भीतर आ कर बैठ गया। उस ख़ामोशी से उसका दिल घबरा रहा था।

उसने टीवी देखने की ज़िद्द की थी पर उसकी माँ का सर दर्द से फटा जा रहा था। उसकी माँ ने उसे फटकार लगा दी थी। वो अपनी माँ से गुस्सा होकर सो गया था। उसे लगा उसकी माँ भी उससे नाराज़ होकर उसे छोड़कर चली गयी है। उस बेचारे भोले मन को क्या पता कि ऐसे छोड़ कर बच्चे जाते हैं, मायें नहीं। घबराहट के मारे उसका दिल ज़ोर से धड़कने लगा।

वो रोने लगा। रोते रोते उसने टीवी का प्लग निकाल दिया और उसे कपड़ा डाल कर ढक दिया। वो वापिस अपने बिस्तर पर आया और अपने घुटनों पर सर टिका कर बैठ गया। रो रोकर उसकी आँखें लाल हो गयी थी। कुछ ही देर में उसकी माँ वापिस आ गयी। उसकी माँ ने उसे गले से लगा लिया। वो अपनी माँ की गोद में लेट गया। उसकी माँ उसके बाल सहलाने लगी। बच्चा धीरे धीरे फिर से सो गया।

Friday, July 14, 2017

वक्त

वक्त भागने लगता है...
मेरी धड़कनों की तरह।

और जब
तुमसे दूर होता हूँ
तो धड़कन
थम जाती है।

Wednesday, July 12, 2017

सुनो

सुनो,
कुछ कहना है तुमसे।

अगर मैं तुम्हें
मन ही मन पसंद करूँ
तो तुम्हें ऐतराज तो ना होगा?
तुम नाराज़ तो ना होगी?

तुम जानती हो!
मैं रात भर जगने लगा हूँ
तुम्हारी ख़ातिर।
कुछ मतलब की बातें खोजता हूँ।
बातें,
जो तुमसे अगले दिन कर पाऊँ।

तेज धड़कनों की आवाज़
सुनी है तुमने?
कभी ख़ामोशी में
मेरे नज़दीक आना।

और हाँ!
एक बात और,
जब तुम
जाने लगती हो ना,
मेरे कदम भी
तुम्हारे पीछे जाने के लिए
मचलने लगते हैं।

तुम्हें
ये सब पता नहीं होगा।

कभी कभार,
थोड़ा चालाकी से देखना
कि मैं कैसे तुम्हें
छुप छुप कर देखता हूँ।
और देखना,
मेरे चेहरे की रौनक
जो तुम्हारे मुस्कुराने से आती है
जब तुम मेरी तरफ़ देखती हो।

सुन रही हो ना?
अब समझ भी जाओ ना
कि ये तुम ही हो।

Wednesday, May 3, 2017

संवेदनशील

मैं,
निराश भी होता हूँ, उदास भी होता हूँ,
कुंठित भी होता हूँ, चिंतित भी होता हूँ,

आहत भी होता हूँ, उल्लसित भी होता हूँ,
आकर्षित भी होता हूँ, उत्साहित भी होता हूँ।

मैं
उम्मीदें रखता भी हूँ
और उन्हें टालने की कोशिश भी करता हूँ।

मैं,
संवेदनशील हूँ।

मैं,
अपनी भावनाओं को
कभी ज़ाहिर भी करता हूँ
कभी ख़ुद में भी रखता हूँ।

Saturday, December 31, 2016

किसमिस

किसमिस, कोई ५-६ साल की होगी। वो भविष्य निधि कार्यालय यानी PF Office की सीढ़ियों पर बैठी खेल रही थी। वहीं पास में किसी कर्मचारी की मेज के सामने उसकी माँ खड़ी थी। हाथ में कागज़ और माथे पर शिकन लिए अपनी बारी आने की प्रतीक्षा कर रही थी। जाने वो चिंता की शिकन थी, घृणा की या फिर क्रोध की।

मैं अपने एक मित्र, राममेहर, के साथ उसके काम के लिए वहाँ गया था। वो नयी दिल्ली स्टेशन आया और हम वहाँ से सीधा द्वारका स्टेशन की ट्रेन पकड़ कर गए। मेट्रो थी, इसी वजह से गर्मी का अहसास नहीं हुआ वर्ना बाहर तो बदन को झुलसाने वाली लू पड़ रही थी। हम लोग द्वारका स्टेशन से उतरे और रिक्शा ढूँढने लगे। बाहर आने पर सोच रहा था कि रिक्शा भी वहीं की वहीं मिल जाए। इतनी गर्मी में बाहर सड़क तक जाने की तो हिम्मत ही नहीं हो रही थी। खैर, अंदर तो कोई रिक्शा मिलीं नहीं इसलिए हम लोग सड़क पर पहुँचे। वहाँ २-३ रिक्शा खड़ी थी। उन रिक्शा चालकों में से एक कोई १४-१५ साल का बच्चा होगा।

मैंने पूछा - छोटे, PF Office के कितने लेगा?

वो बोला - ३० रुपये।

वहीं खड़ा रिक्शा वाला, जो काफी जवान था, बोला - चलिए भैया मुझे २० रुपये दे दीजियेगा।

राममेहर बोला - क्या भाई, बच्चे को भी कमा लेने दे।

हम लोग बच्चे की रिक्शा में चढ़े। कोई १०-१५ मिनट का रास्ता था। एक मैं था जो कुछ पल की गर्मी के कारण परेशान हो रहा था और एक वो बच्चा जो इतनी कड़ी धूप में भी रिक्शा चला रहा था। अभी तो उम्र से वो कच्चा ही था।

मैंने उससे पूछा - स्कूल भी जाता है कि नहीं?

"जाता हूँ।"

"कौन सी क्लास में?"

"आठवीं में।"

"कौन से स्कूल में।"

"सरकारी स्कूल में।"

उसकी आवाज में तीखापन था, जैसे वो मेरे सवालों से तंग हो रहा हो। मेरे सवाल ख़त्म हुए तो राममेहर के शुरू हो गए।

"सचमुच जाता है या झूठ बोल रहा है?"

"जाता हूँ।"

"तो फिर आज क्यों नहीं गया?"

"आज छुट्टी ले ली थी।"

"तो फिर हर रोज रिक्शा कैसे चलाता है?"

"स्कूल से आने के बाद।"

"और पढ़ाई किस समय करता है?"

"पढ़ता हूँ।"

"क्या नाम है तेरा?"

"राजा।"

"हमको तेरे बारे में सब पता चल गया है, हम तेरे स्कूल में आके देखेंगे कि तू सच बोल रहा है कि नहीं।"

"पूछ लेना।"

हम लोग PF Office के सामने उतरे, उसे पैसे दिए और अंदर चले गए। कोई सौ कदम भी नहीं चलने पड़े थे कि मैं पसीने से तर बतर हो गया था, और मेरी साँस भी फूलने लगी थी। मेरे दिल की धड़कन तेज हो गयी थी। राममेहर पूछताछ केंद्र की तरफ़ गया और मैं वहीं पास में एक कुर्सी पर बैठ गया। मैंने कुछ देर लंबी लंबी सांसें ली तब जाकर कहीं मेरे अंदर का संतुलन बना।

थोड़ी देर बाद राममेहर मुझे लेकर एक कमरे की तरफ़ गया। उस कमरे के एक कोने में काफी बड़ी उम्र के अंकल बैठे थे। वो उसी दफ्तर के कर्मचारी थे। उसके सामने एक मेज रखी थी जिस पर उसका कंप्यूटर और कुछ कागज़ात रखे थे। उसकी मेज के सामने लोग दो कतारों में खड़े थे जबकि उन्हें एक ही कतार में खड़ा रहने को कहा जा रहा था। आगे वाले लोग अपना काम निकलवाने की जल्दी में और पीछे वाले लोग अपनी बारी आने की जल्दी में थे। उक्त अधिकारी लोगों पर चिल्ला रहे थे, "सब लोग एक ही लाइन में खड़े हो जाओ वर्ना मैं काम करना बंद कर दूँगा।"

उनकी बायीं तरफ़ कुछ तीन गज की दूरी पर दो और कर्मचारी बैठे थे। उनके पास भी भीड़ जमा थी पर वो अपना काम शान्ति से कर रहे थे। शायद उन्हें नौकरी लगे ज्यादा समय नहीं हुआ होगा। इसी वजह से वो अपने काम का आनंद ले रहे थे। वहीं उसी कमरे में दरवाज़े के पास वाले एक कोने में सीढियाँ बनी हुई थी।

मैं वहाँ जाकर बैठ गया। मेरी दायीं तरफ़ वो छोटी बच्ची खेल रही थी। उसने मेरी तरफ़ देखा। मैं उसे देखकर मुस्कुराया। उसने मुह फुलाकर धीरे से अपना सर दूसरी तरफ़ घुमा लिया। कुछ पल बाद फिर मेरी तरफ़ देखा। मैं फिर मुस्कुराया। उसने एक झटके से फिर अपना सर घुमा लिया। मैं उसकी तरफ़ देखता रहा। कितना प्यारा, मासूम और चित आकर्षित कर लेने वाला चेहरा था। जब भी हम दोनों की नज़रें मिलती थी तो वो अपनी गोल मटोल सी आँखें झुका लेती थी। वो कुछ भी तो बनावटी नहीं था। मैं उसे देखते देखते खो सा गया था। जैसे मेरा उस नन्हीं सी जान से काफी गहरा रिश्ता हो। मैं अपने से जुड़ी हर बात भूल गया था। मेरे अंदर कोई अशांति, घबराहट, परेशानी और अधीरता कुछ भी बाकी नहीं था। बस एक अहसास था।

मेरी नज़र वहीं पास खड़ी उसकी माँ पर पड़ी। उसकी माँ ने भी मेरी तरफ देखा। उन्होंने बिना ये सोचे कि मैं उनकी बातों में दिलचस्पी लूँगा या नहीं, बोलने लगी, "कितने दिन हो गए चक्कर लगाते लगाते, ये लोग कोई काम करके ही नहीं दे रहे।"

मैं उसे ध्यान से सुनने लगा। उसने अपनी बात जारी रखी, "मेरे पति का एक्सीडेंट हो गया इस होली के बाद और अब दो महीने हो गए। उनके PF का पैसा आधा तो मिल गया था बाकी आधे का पेंशन में बदल रहे हैं। कभी बोलते है ये कागज़ नहीं है कभी वो नहीं है। प्रतापगढ़ से आयीं हूँ, इतनी गर्मी में मेरी बच्ची को साथ में लाना पड़ता है।"

मैंने पूछा - उनके ऑफिस में गए थे? क्या कहा उन्होंने?

वो बोली - गयी थी। वहाँ का चपरासी मेरे साथ मदद करने आया है।

तभी वो व्यक्ति वहाँ आया। वो गुस्से में था।

मैंने पूछा - ऑफिस में कोई होगा ना जो ये सब संभालता होगा।

वो बोला - है। लेकिन उसने एक जरुरी फॉर्म भरके आगे भेजा ही नहीं।

वो उसकी माँ की तरफ घूमा - उस विजय ने कोई फॉर्म नहीं दिया है। उस फॉर्म के बिना यहाँ कुछ नहीं कर सकते।

उसकी माँ बोली - कल मुझे ऑफिस लेके चलना, मैं उस विजय की खबर लूँगी।

ये देख ख़ुशी हुई कि वो व्यक्ति बिना किसी अपेक्षा के उनकी मदद कर रहा था। वो बच्ची अब मुझे देख कर मुस्कुरा रही थी। राममेहर अपने काम की पूछताछ कर वापिस आया।

मैं उसके साथ बाहर की तरफ़ चल दिया। उसके फॉर्म में नाम की गलती थी। उसके हर कागज़ में उसका अलग ही नाम था। उसके नाम की स्पेलिंग हर कागज़ में गड़बड़ थी। उसे नाम बदलने के लिए एक और फॉर्म भरना था। कुछ देर बाद हम फिर उसी कमरे में गए। बच्ची की माँ वहीं खड़ी थी लेकिन बच्ची नहीं थी। उसकी माँ ने मुझसे उसे देख आने के लिए निवेदन किया। मैं बाहर देखकर आया। वो उसी चपरासी के साथ बैठी थी। मैंने आकर उन्हें बता दिया।

राममेहर का वहाँ का काम निपट चुका था। हम लोग बाहर की तरफ गए। राममेहर अपने ऑफिस फ़ोन करने लगा। मैं तब तक इधर उधर घूमने लगा। वो बच्ची और वो चपरासी वहीं कुछ दूरी पर बैठे हुए थे। तभी उसकी माँ भी वहाँ आ गयी। मैं उनके पास गया और उस बच्ची का नाम पूछा।

"किसमिस।"

Friday, December 30, 2016

क्रिसमस, ममता घर और मिट्टी के रंग

जीवन में सबसे बड़ा सवाब का काम होता है एक बच्चे के चेहरे पर मुस्कराहट लाना। कुछ दिन पहले क्रिसमस के दिन मुझे कुछ बच्चों के साथ समय बिताने का अवसर मिला। वो बच्चे, जिनके सर माँ बाप का साया नहीं है। ममता फाउंडेशन नाम की एक संस्था है जो उन बच्चों पर अपना आशीर्वाद बनाये हुए है। मेरा मित्र अमित जैन "मिट्टी के रंग" नाम से एक संस्था चलाता है जो सामाजिक कार्य करती रहती है। उसने ही एक कार्यक्रम आयोजित किया जिसमे हमें बच्चों के लिए तोहफ़े खरीदने थे।

इस तरह का ये मेरा पहला अनुभव था। मैं और मेरा दोस्त अंकित बड़े चाव से ये सोचने लगे कि तोहफ़े में क्या देना चाहिए। हम अनुमान लगा रहे थे कि बच्चे कैसे रह रहे होंगे। सभी प्यार से रहते होंगे या हॉस्टल के बच्चों की तरह आपस में लड़ते भी होंगे। सबको अगर अलग अलग तोहफा मिला तो क्या एक दूसरे को चिढ़ाएँगे या फिर आपस में मिल बाँट कर इस्तेमाल करेंगे। इसी तरह के निरर्थक प्रश्न मन में उठ रहे थे। मेरे ही ऑफिस के दो और मित्रों विशाल और कर्निका ने भी तोहफ़े दिए। कर्निका तो मुझसे भी ज्यादा उत्साही थी। अपने तोहफों को प्यार से बनाया भी और सजाया भी।

पायल और कौस्तुभ आयोजक का कार्यभार संभाले थे। क्रिसमस का दिन और हम सब इकट्ठे हो ममता घर पहुचें। तोहफ़े बाटने से पहले चित्रकला प्रतियोगिता रखी गयी। सब बच्चों को अपनी अपनी प्रतिभा का छोटा सा नमूना दिखाना था। आधे घंटे में ही सब बच्चों ने कोरे कागज पर अपने रंग बिखेर दिए थे। कुछ ने पहाड़ बनाया तो कुछ ने चुहिया, कुछ ने दिवार पर लगे चित्रों की नक़ल की तो कुछ ने अपने मन से बनाया। एक बच्चा ने ईसा मसीह का चित्र बनाया था। चित्र में यीशु दो लोगों के बीच में सूली पर लटके हुए हैं।

प्रतियोगिता ख़तम हुई। तोहफ़े बांटे गए। सब याद के तौर पर फ़ोटो खींचने लगे। बच्चों ने तोहफ़े लिए और चटाई पर सबने इकट्ठे रख दिए। बच्चों के मन में तोहफ़े के प्रति भावना "मेरे लिए" वाली नहीं "हम सबके लिए" वाली थी। बच्चे प्यार से रहते हैं। एक दूसरे के साथ हँसी ठिठौली करते हैं। एक दूसरे का ख्याल रखते हैं। मैं उन्हें प्यार देकर ही नहीं उनसे प्यार लेकर भी आया।


Thursday, November 24, 2016

धर्म और विज्ञान

मैंने एक किताब पढ़नी शुरू की है जिसका शीर्षक है, "They Laughed at Galileo: How the Great Inventors Proved Their Critics Wrong." नाम से तो आप समझ ही गए होंगे कि किताब किस विषय में बात करती है। इस किताब में कुछ आविष्कार और आविष्कारकों से जुड़े रोचक तथ्य बताये गए हैं। उन्हीं महान लोगों में से एक इटली के भी थे, जिनका नाम था गैलिलियो गैलिली। गैलिलियो भैया बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे।

वो गणितज्ञ थे, खगोल शास्त्री थे और भौतिकी विज्ञान के भी ज्ञाता थे। एक दिन शायद उनके हाथ एक दूरबीन यानी telescope लग गयी। उस समय दूरबीन कुछ क्षेत्रों जैसे समुंद्री जहाज़, नौ सेना में काफी सहायक था। उस समय की दूरबीन से समुंद्री जहाज को २ घंटे पहले ही देखा जा सकता था। लेकिन अपने गैलिलियो भैया तो और भी अधिक दूर तक देखना चाहते थे। तो हुआ यूँ कि भैया जी ने घर बैठे बैठे एक दूरबीन बनायीं जो आसमान तक नजर रखती थी।

भैया जी अपने दूरदर्शक यंत्र से सितारों को निहारते हुए एक तारे से नैना लड़ा बैठे। उस तारे का नाम था, Jupiter यानी बृहस्पति। उन्होंने देखा कि चार तारे बृहस्पति के चक्कर लगा रहे हैं। अब भैया ठहरे खगोल शास्त्री, बस यहीं उनके दिमाग में खुजली हुई। उन्होंने पता लगा लिया कि बृहस्पति कोई तारा नहीं बल्कि एक गृह है और वो चार तारे वहाँ के चाँद है। बस फिर क्या था भैया जी ने एक किताब लिख डाली और सनसनी फैला दी।

अभी भैया यहीं रुकने वालों में से नहीं थे। अब बारी आयी शुक्र गृह की यानी Venus। अब की बार उनका ध्यान इसके आकार पर गया। शुक्र गृह का आकार बदलता रहता था। बस यहीं भैया जी का माथा ठनका। उन्हें समझते देर नहीं लगी कि धरती नहीं बल्कि सूर्य ब्रह्मांड के केंद्र में है और सब गृह सूर्य के चक्कर लगा रहे हैं। बस यहीं से समस्या उत्पन्न हो गयी। उनके विचार वहाँ के धर्म ग्रन्थ बाइबिल से टकरा गए। बाइबिल के मुताबिक़ धरती ही विश्व का केंद्र है। उससे भी बड़ी समस्या ये कि वो खुद भी बाइबिल में विश्वास रखते थे। उन्होंने ये समझाने की बहुत कोशिश की कि ये बाइबिल के विरुद्ध नहीं है। वो अपने काम को लेकर जगह जगह घूमे। अंत में उन्हें उनके काम को वहीं त्याग देने के आदेश मिले। उन्होंने भी उस समय विवाद से दूर रहना ही बेहतर समझा और अपनी ख़ोज चुपचाप करते रहे।

कुछ सालों बाद उन्होंने एक और पुस्तक लिखी जिसका शीर्षक था "Dialogue Concerning the two Chief World Systems". इस पुस्तक में उन्होंने अपने विचार फिर से रखे। अपनी तरफ से उन्होंने हर संभव कोशिश की कि पुस्तक विवादों में ना फसे पर ऐसा हुआ नहीं। बाइबिल को गलत बताने के जुर्म में उन्हें आजीवन कारावास झेलना पड़ा। और कुछ साल बाद ही वो स्वर्ग सिधार गए।

Tuesday, November 8, 2016

मुस्कान

सुबह, दोपहर, शाम,
मैं जब भी
बाहर निकलता हूँ,

कुछ नन्हें हाथ
मेरे बाजूओं
को पकड़
खींचनें लगते है।

मैं उनकी
मुरझाई
मासूम शक्लों
को देखता हूँ।

कुछ की नजरों में
मुझे
उम्मीद दिखती है,
कुछ के हाथों में
जिम्मेदारियाँ,

खाली पेट
जिम्मेदारियाँ।

कभी कभार,
मैं उनकी भूख
बाँट लेता हूँ,

और उनकी आँखों की चमक,
उनके होठों की मुस्कान
देख
मुस्कुरा लेता हूँ।

Friday, October 21, 2016

Why I do Trekking...?

My friends often ask me, "Why do you trek?" I become speechless. I don't know how to convince them. I am not good at convincing people by arguments. I think thats why I started writing. So, here I am writing about my experience of trekking.

Two years back, I got the job in QED42, Pune. Before that, I lived in my hometown. I never experienced hostel life, school/college tour or any kind of adventurous activity. I didn't even know the word "Trekking". I am from a small village and I used to travel by bus from my village to Hisar (Haryana), where I had my college and my first company where I worked for three years. Then I moved to Pune.

Pune was like new world to me. In QED42, boss was like a friend. Employees were motivator rather than competitor to each other. Just after one month of my joining, I was invited to our office's annual retreat. Here I got to know about trekking. We did other activities as well like jungle safari, rock climbing, rappelling and rafting. But the most amazing thing for me was trekking. I fell in love with mountains after that. Mountains taught me how to live.

I have learnt following lessons of life from trekking:

Grateful: You learn to appreciate everything and everyone in our life. You learn to respect the nature. You learn to thank yourself.

Overcome Your Fear: You may see many blockers and ridges while trekking. It becomes risky sometimes to cross those ridges. Here we learn to concentrate in our difficult situations. We have confidence to face any problem of our life.

Helping Hands: You will meet selfless people who are there to help you, to save you. You are also one of them.

More in Less: You learn to be happy with what you have. You learn to survive in difficult phase of your life.

Independent: You are out of your comfort zone. You don't have to expect anything from anyone. You can achieve everything.

Keep Moving Forward: Once you started, you don't want to look back.

Enjoy Your Journey: The path you are walking on is more important and memorable than the destination.

Friends for Life: You meet a lot of people in your journey. Few of them becomes friends for the lifetime. I have met few amazing personalities while trekking. But there are two that I want to mention, Sanket and Suyashi. Sanket, is the most humble person I have ever seen. He works like 18hrs a day to follow his dreams but still he is just a call away from me. Suyashi, I met her once only but talked to her a lot. I am not sure what to say about her, but she is a unique girl (though girl things don't suits her :P).

Love Yourself: While trekking you are with everyone but still you are with yourself. For me, mountains are the best place where I get to know about myself. It is like meeting a new amazing person who lives inside us. I promise you will meet a new you every time you go on a trek.